अंतिम पत्र — डॉ इंदु भार्गव जयपुर

डाकिए ने जब वह लिफ़ाफ़ा उसके हाथ में रखा, तो उसके हाथ अचानक काँपने लगे।
लिफ़ाफ़े पर वही लिखावट थी—थोड़ी झुकी हुई, कुछ जगहों पर स्याही फैली हुई और अक्षरों के बीच वही पुरानी जल्दबाज़ी।
“अंतिम पत्र…”
वह कुछ क्षण तक उसे खोल नहीं सकी।
कमरे में खिड़की के पास रखी कुर्सी पर बैठकर उसने लिफ़ाफ़े को सीने से लगा लिया। बाहर बारिश हो रही थी। बिल्कुल वैसी ही बारिश, जैसी उस दिन हुई थी जब वह आख़िरी बार उससे मिला था।
उस दिन उसने जाते-जाते कहा था—
“मैं तुम्हें बहुत कुछ कहना चाहता हूँ… बस थोड़ा समय दो।”
और उसने हँसकर जवाब दिया था—
“पूरी ज़िंदगी पड़ी है, कह देना।”
उसे क्या पता था कि कुछ वादे पूरे होने के लिए नहीं, याद बन जाने के लिए किए जाते हैं।
उसने काँपती उँगलियों से लिफ़ाफ़ा खोला।
अंदर सिर्फ़ दो पन्ने थे।
“प्रिय प्रिया ,
पता नहीं यह पत्र तुम्हें कब मिलेगा।
शायद तब, जब मेरे होने और न होने के बीच का फ़र्क़ सिर्फ़ तुम्हारी यादों में बचा होगा!
मैंने तुमसे हमेशा कहा कि मैं लौटूँगा!!
लेकिन आज पहली बार यह लिखते हुए डर लग रहा है कि शायद मैं अपना वादा पूरा न कर पाऊँ!!
तुम्हें याद है, तुमने एक बार पूछा था—‘अगर मैं तुमसे बहुत दूर चली गई तो?’
मैंने कहा था—‘तुम जहाँ जाओगी, मेरी आवाज़ तुम तक पहुँच जाएगी।’
आज समझ आया कि आवाज़ से ज़्यादा ताक़त यादों में होती है!
इसलिए जब कभी तुम्हें मेरी याद आए, मुझे ढूँढ़ना मत!!
किसी पुराने स्टेशन पर मत जाना,
मेरी तस्वीरों में मत उलझना,
मेरे नाम से जुड़े रास्तों पर मत ठहरना!!
बस अपनी खिड़की खोल देना।
अगर हवा तुम्हारे बालों को छूकर गुज़रे, तो समझना मैं आया था।
और हाँ…
अपने आप को कभी यह मत कहना कि तुमने मुझे खो दिया।
सच तो यह है कि जिस दिन मैंने तुम्हें पहली बार देखा था, उसी दिन से मैंने अपना एक हिस्सा तुम्हारे पास छोड़ दिया था!
वह हिस्सा आज भी तुम्हारा है,
शायद इसी वजह से जाने के बाद भी मैं पूरा नहीं जा पाऊँगा!!
तुम्हारे साथ बिताए वे छोटे-छोटे पल मेरी पूरी ज़िंदगी से बड़े थे
तुम्हारा नाराज़ होकर चुप हो जाना…
फिर थोड़ी देर बाद बिना वजह मुस्कुरा देना…
मेरी बुरी कविताओं पर भी तालियाँ बजाना…
मेरा हर बार जाते हुए उन से कहना —‘जल्दी लौटना।’
काश, मैंने तब तुम्हें बताया होता कि तुम्हारा यह एक वाक्य मेरे लिए पूरी दुनिया था।
अब शायद बहुत देर हो चुकी है।
यह मेरा अंतिम पत्र है, इसे पढ़कर रोना मत।
मुझे तुम्हारी आँखों में आँसू अच्छे नहीं लगते।
और अगर रो ही पड़ो…
तो सिर्फ़ एक बार।
फिर मुस्कुरा देना।
क्योंकि मैं चाहता हूँ कि मेरी आख़िरी याद तुम्हारी मुस्कान हो।
तुम्हारा,
हमेशा…
प्रेम ।”
पत्र मेरे हाथ से गिर गया।
मैं बहुत देर तक बिल्कुल शांत बैठी रही।
फिर मैं ने खिड़की खोल दी।
बारिश की ठंडी हवा भीतर आई और मेरे बालों को हल्के से छूकर गुज़र गई।
मैं ने आँखें बंद कर लीं।
होंठों पर एक बहुत छोटी-सी मुस्कान आई।
और आँखों से एक आँसू चुपचाप गिर पड़ा।
उसने आसमान की ओर देखकर धीमे से कहा—
“तुमने कहा था न… लौटोगे?”
हवा फिर चली।
इस बार मैं ने ने उसे रोकने की कोशिश नहीं की।
क्योंकि मुझे लगा—
शायद कोई बहुत दूर से आया है…
सिर्फ़ अपनी अंतिम विदाईके लिये।तिरंगे मे लिपटी पार्थिव देह!!
डॉ इंदु भार्गव जयपुर




