लेख: मृत्यु की निजता और डिजिटल युग लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

मृत्यु वह नितांत निजी क्षण होता है जब एक मनुष्य अपने पार्थिव शरीर का त्याग कर इस संसार से विदा ले लेता है। मृत्यु की घटना के साथ निजता और मानवीय गरिमा जुड़ी होती है। मध्ययुगीन समाज में राज्य की ओर से दोषियों को दिए जाने वाले मृत्युदण्ड की प्रक्रिया अक्सर सार्वजनिक और क्रूरतम हुआ करती थी। वह प्रक्रिया मरने वाले मनुष्य की मानवीय गरिमा को तार-तार कर डालती थी। मरने वाला अपने अंतिम क्षणों में स्वयं को कितना अपमानित और लज्जित महसूस करता होगा इसका तो केवल अंदाज़ा ही लगाया जा सकता है। अतः जैसे-जैसे समाज शिक्षित और मानवीय गरिमा के प्रति संवेदनशील बनता गया, वैसे-वैसे मृत्युदण्ड की प्रक्रिया को भी अधिक मानवीय और एक निजी क्षण बनाया जाने लगा।
आज सोशल मीडिया के डिजिटल युग में मृत्यु की निजता को चौराहे पर लाकर खड़ा कर दिया जिसके कारण मृत्यु के साथ जुड़ी गरिमा का भी ह्रास होने लगा है। सोशलिस्ट मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे फेसबुक, इंस्टाग्राम, थ्रैड, वाट्सअप, इत्यादि पर निरंतर सक्रिय बने रहना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। प्रतिदिन कुछ न कुछ पोस्ट करने, पोस्ट्स पर अधिकाधिक व्यूज, लाइक्स और सब्सक्राइबर्स/फालोवर्स बढ़ाने की बाध्यता ने डिजिटल क्रिएटर्स को मानव से एक मशीन में बदल दिया है। चूंकि हर क्रिएटर का सोशल मीडिया से आमदनी करना ही मुख्य लक्ष्य होता है। अतः इस दबाव की तीव्रता उनकी पोस्ट्स में साफ़ झलकती है। रोज़-रोज़ नई-नई पोस्ट डालने के लिए सामग्री का अभाव एक डिजिटल क्रिएटर को अपने निजी क्षणों को सार्वजनिक करने के लिए प्रेरित करता है। शुरूआती दौर में लोगों ने अपने ख़ुशी के पलों को साझा करना शुरू किया लेकिन बात उतने भर से भी नहीं बन पा रही थी। अतः डिजिटल क्रिकेटर्स ने अपने परिजनों और दोस्तों की मृत्यु की घटनाओं को भी पोस्ट कर व्यूज, लाइक्स, सब्सक्राइबर्स और फालोवर्स बढ़ाने का ज़रिया बना लिया। जिसकी वजह से मरने वाले की निजता भंग होने लगी। इस प्रक्रिया में मौत अंजान लोगों के बीच एक तमाशा बन कर रह जाती है।
ऐसा नहीं कि डिजिटल क्रांति के केवल नुकसान ही हैं। मृत्यु की सूचना देने के लिए आज सोशल मीडिया एक त्वरित और सशक्त माध्यम बन गया है। लेकिन, यदि मृत्यु की घटना का सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने के लिए प्रयोग किया जाता है तो वह निश्चित ही मृत्यु की निजता को भंग करता है।
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