साहित्य संगम मंच पर जन्माष्टमी एवं शिक्षक दिवस विशेष मासिक काव्य गोष्ठी
भक्ति, ज्ञान और काव्य-संवेदना से सजी अविस्मरणीय साहित्यिक संध्या
साहित्य संगम मंच के तत्वावधान में 05 सितंबर 2026 को आयोजित मासिक काव्य गोष्ठी जन्माष्टमी एवं शिक्षक दिवस की पावन भावभूमि को समर्पित रही। यह गोष्ठी केवल काव्य-पाठ का आयोजन न होकर भक्ति, ज्ञान, संस्कार, समर्पण और साहित्यिक संवेदनाओं का सुंदर संगम बन गई।
गोष्ठी की अध्यक्षता मंच की संस्थापिका एवं साहित्यकार शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ ने की। उन्होंने मुख्य अतिथि ममता किरण जी का आत्मीय परिचय प्रस्तुत करते हुए उनका हार्दिक स्वागत किया और उनके साहित्यिक व्यक्तित्व एवं रचनात्मक अवदान से सभी रचनाकारों को परिचित कराया।
कार्यक्रम का शुभारंभ सुनीला नारंग जी द्वारा माँ सरस्वती के वंदन एवं अपने भावपूर्ण दोहों के माध्यम से किया गया। उनके दोहों में ज्ञान, वाणी और साहित्य की अधिष्ठात्री माँ सरस्वती का ऐसा भावपूर्ण आवाहन हुआ कि पूरी साहित्यिक गोष्ठी भक्तिरस से सराबोर हो उठी।
मुख्य अतिथि ममता किरण जी ने भगवान श्रीकृष्ण के गीता-उपदेशों को अपने शेरों में पिरोते हुए एक शानदार ग़ज़ल प्रस्तुत की। उनके अशआर में कर्म, कर्तव्य, जीवन-दर्शन और आत्मविश्वास का अद्भुत समन्वय दिखाई दिया। ग़ज़ल ने श्रोताओं को कृष्ण के शाश्वत संदेश से जोड़ते हुए गहन चिंतन की अनुभूति कराई।
गोष्ठी अध्यक्ष शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ ने अपनी रचना के माध्यम से आज के कलयुग की विषम परिस्थितियों में कान्हा को पुकारा। उन्होंने धरती पर बढ़ते संकटों, मानवीय पीड़ा और सामाजिक विडंबनाओं के बीच श्रीकृष्ण के उस वचन को स्मरण कराया कि जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होगी, तब-तब वे अवश्य प्रकट होंगे। उनकी प्रस्तुति में आस्था के साथ वर्तमान समय की बेचैनी और परिवर्तन की पुकार स्पष्ट दिखाई दी।
अलका गर्ग जी ने अपने सधे हुए और प्रभावशाली संचालन से पूरे कार्यक्रम को सुंदर गति प्रदान की। उनके संचालन के साथ कृष्ण के मनमोहक श्रृंगार की प्रस्तुति ने वातावरण में ब्रज की छटा, माधुर्य और वात्सल्य घोल दिया।
गणपत सिंह भदौरिया जी ने अपनी रचना में श्रीकृष्ण को गुरु रूप में प्रस्तुत करते हुए उनके जीवन-दर्शन और गीता के संदेश को रेखांकित किया। उनकी प्रस्तुति ने कृष्ण के उस विराट स्वरूप को सामने रखा, जो केवल मुरलीधर ही नहीं, बल्कि जीवन के पथ पर दिशा दिखाने वाले महान मार्गदर्शक भी हैं।
प्रो. शरद नारायण खरे जी ने कृष्ण को समर्पित अपने शानदार मुक्तकों से गोष्ठी को समृद्ध किया। उनके मुक्तकों में भाव, चिंतन और काव्य-सौंदर्य का सुंदर संतुलन देखने को मिला।
सीमा पुरबा ‘सिम्मी’ जी ने कन्हैया की नटखट शरारतों को अपनी मनमोहक प्रस्तुति में जीवंत कर दिया। उनकी रचना में बाल-कृष्ण की चंचलता, निश्छलता और मनोहारी लीलाओं का ऐसा चित्र उभरा कि वातावरण में ब्रज की गलियों और गोकुल की स्मृतियों का आभास होने लगा।
आशा दिनकर ‘आस’ जी ने श्रीकृष्ण जन्म की अद्भुत और भावपूर्ण रचना प्रस्तुत की। उनके काव्य में कृष्ण जन्म की दिव्यता, उल्लास और आध्यात्मिक ऊर्जा का सुंदर चित्रण दिखाई दिया।
वीना टंडन जी ने श्रीकृष्ण के जीवन की विविध घटनाओं को अपनी रचना में समेटते हुए उन्हें सुरों में बाँधा। उनकी प्रस्तुति में काव्य और संगीत का मनोहारी संगम देखने को मिला और कृष्ण की जीवन-यात्रा श्रोताओं के सामने गीतात्मक रूप में साकार हो उठी।
शिक्षक दिवस की भावभूमि को आगे बढ़ाते हुए मीरा सजवान जी ने शिक्षक को समर्पित भावपूर्ण दोहे प्रस्तुत किए। उनके दोहों ने शिक्षक के उस महत्त्व को रेखांकित किया, जो ज्ञान के साथ-साथ जीवन को सही दिशा देने का कार्य करता है।
पुष्पा झा जी ने गोपियों के विरह-वेदना को अपनी अत्यंत खूबसूरत रचना में स्वर दिया। उनकी प्रस्तुति में विरह की पीड़ा के साथ प्रेम की वह उदात्त भावना भी दिखाई दी, जिसमें गोपियाँ स्वयं व्यथित होते हुए भी कान्हा को उनके मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते रहने का संदेश देती हैं। उनकी रचना ने प्रेम के त्यागमय और निष्काम स्वरूप को अत्यंत मार्मिकता से अभिव्यक्त किया।

अलका जैन ‘आनंदी’ जी ने कन्हैया को समर्पित मधुर गीत प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिरस से भर दिया। उनकी गीतात्मक प्रस्तुति ने कार्यक्रम के भाव-पक्ष को और अधिक सशक्त एवं मधुर बना दिया।
इस प्रकार गोष्ठी में प्रस्तुत प्रत्येक रचनाकार ने कृष्ण के व्यक्तित्व के अलग-अलग आयामों—बाल-लीला, श्रृंगार, प्रेम, विरह, नीति, कर्म, ज्ञान, गुरु-स्वरूप और जीवन-दर्शन—को अपनी-अपनी रचनात्मक दृष्टि से अभिव्यक्त किया। वहीं शिक्षक दिवस के माध्यम से ज्ञान और संस्कार प्रदान करने वाले शिक्षकों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता भी व्यक्त की गई।
पूरी गोष्ठी में कहीं मुरली की मधुर तान सुनाई दी, कहीं गीता का जीवन-दर्शन, कहीं गोपियों का विरह, तो कहीं बाल-कृष्ण की नटखट छवि मन को मोहती रही। इस विविधता ने कार्यक्रम को अत्यंत जीवंत, भावपूर्ण और स्मरणीय बना दिया।
अंत में गोष्ठी अध्यक्ष शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ ने मुख्य अतिथि ममता किरण जी, सभी सम्मानित रचनाकारों एवं आयोजन से जुड़े सभी साहित्य-प्रेमियों के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया। उन्होंने सभी प्रतिभागियों की सुंदर प्रस्तुतियों की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे आयोजन साहित्य को केवल मंच ही नहीं देते, बल्कि भावों को स्वर, विचारों को दिशा और रचनाकारों को एक-दूसरे से जुड़ने का अवसर भी प्रदान करते हैं।
साहित्य संगम मंच की यह विशेष मासिक गोष्ठी भक्ति और साहित्य, कृष्ण और कर्म, शिक्षक और ज्ञान—इन सभी भावों को एक सूत्र में पिरोती हुई एक यादगार साहित्यिक संध्या बनकर संपन्न हुई।
साहित्य संगम मंच
जहाँ शब्द केवल लिखे नहीं जाते, भावों के साथ जिए भी जाते हैं।




