आलेख: पितृदेव: हमारी विरासत – पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर गुजरात)

भारतीय संस्कृति में पितृ देवो भव:,मातृ देवो भव:,गुरुदेवो भव:,अतिथि देवो भव:, ऐसा माना जाता है।उस को देव तुल्य दरज्जा दिया गया है। माता पिता हमारे केवल जन्मदाता नहीं बल्कि पितृ देव हमारी विरासत संस्कार और अस्तित्व के आधार है।पितृ देव एक वटवृक्ष की छाया है जिसमें हमारा परिवार पनपता है। उसके संघर्ष त्याग में ही हमारा वर्तमान खड़ा है। पितरों ने हमें दौलत नहीं नाम, पहचान और संस्कार दिया है।उसका अनुभव हमारा मार्गदर्शन बनते हैं। हमें जीवन जीनेका सही मार्ग दिखाते हैं।उसका आशीर्वाद सदैव मिलता रहता है।पितृपक्ष या श्राद्ध केवल कर्मकांड नहीं है हमारे पितरों को याद करने का एक अवसर है।श्राद्ध के दिन हम पितरों का तर्पण करते हैं पूजन अर्चन करते हैं। श्रद्धा से ही श्राद्ध क्रिया करने में देवों की कृपा हम पर बरसती रहती है।पितरों का हमें सम्मान करना चाहिए। पितरों के आशीर्वाद से हमारा जीवन सुखमय रहता है। पुरखों को याद करने से हमारे संकट दूर हो जाते हैं। यदि हम पर विपदाएं आए तो वे परिवार की ढाल बनते है।हमारा कल्याण होता है।
माता पिता प्रत्यक्ष देवता है। माता ममता और स्नेह की मूरत होती है। यही दूसरी ओर पिता त्याग, अनुशासन, सुरक्षा, समर्पण का प्रतीक है।हमारे जीवन को संवारने में माता पिता की भूमिका अमूल्य होती है।वे अपनी इच्छाओं का दमन करके संतान के सपनों उज्जवल भविष्य की कामना करते हैं।पूर्वजों ने हमारे वंश समाज और संस्कारों को सींचा है। पितरों का ऋण चुकाना हमारा कर्तव्य है। पितरों ऋण मुक्ति पाने का मार्ग है। केवल उनका आदर सम्मान नहीं उनके दिखाए मार्ग पर हमें चलना है।उनको याद कर उनकी स्मृतियों को जीवंत रखना है।पितरों की तिथि के दिन पिंडदान और तर्पण करते हैं। दान दक्षिणा ब्रह्म भोजन कराते हैं।अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।यह कर्म किसी अंधविश्वास का प्रतीक नहीं बल्कि पितरों के प्रति हमारे श्रद्धा,प्रेम और ऋण चुकाने का एक भावुक पवित्र अनुष्ठान है। इस प्रकार हम सब पितरों के ऋण से मुक्त होने का प्रयास करते हैं। सचमुच पितृ देव हमारी विरासत है।
“प्रेम से अर्पित जल करें और नमाए शीश,
पितृपक्ष में मिलता हमें पितरों के आशीष।”
पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर गुजरात)




