लघुकथा – अपना सा – सुनीता तिवारी सरस

रिया नए शहर में नौकरी के सिलसिले में आई थी। बड़ा-सा मकान, अनजान गलियाँ और चारों ओर अपरिचित चेहरे, सब कुछ होते हुए भी उसे भीतर से खालीपन महसूस होता था।
एक शाम वह बाजार से लौट रही थी। रास्ते में बारिश शुरू हो गई। पास की छोटी-सी चाय की दुकान देखकर वह वहीं रुक गई।
“बेटी अंदर आ जाओ, भीग जाओगी, बूढ़े दुकानदार ने मुस्कुराकर कहा।
रिया चुपचाप बेंच पर बैठ गई। दुकानदार ने बिना पूछे अदरक वाली चाय उसके सामने रख दी।
आपको कैसे पता कि मुझे अदरक वाली चाय पसंद है? रिया ने आश्चर्य से पूछा।
वह हँसते हुए बोला, “पता नहीं, बस मन ने कहा कि तुम्हें यही अच्छी लगेगी।
उस एक वाक्य ने रिया के भीतर जैसे कोई बंद दरवाजा खोल दिया। उसे अपने पिता याद आ गए, जो उसकी पसंद बिना पूछे समझ लेते थे।
बारिश थम गई, मगर रिया कुछ देर और बैठी रही।
अगले दिन से वह रोज उसी दुकान पर जाने लगी। कभी चाय पीती, कभी बस कुछ देर बातें करती। धीरे-धीरे वह बूढ़ा दुकानदार उसके लिए शहर में एक परिचित चेहरा नहीं, बल्कि अपनेपन का एहसास बन गया।
एक दिन उसने पूछा, बाबा, आप मुझे बेटी क्यों कहते हैं?
बूढ़े ने चाय छानते हुए कहा, क्योंकि रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते। कभी-कभी किसी का व्यवहार दिल को इतना छू जाता है कि अनजान भी अपना सा लगने लगता है।
रिया मुस्कुराई। उसे समझ आ गया,घर ईंटों से नहीं, अपनेपन से बनता है।
सुनीता तिवारी”सरस”




