लेख: सूचनाओं के युग में सच की तलाश लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

सूचनाओं का एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक अविरल प्रवाह हर युग की आवश्यकता रही है। सामरिक आसूचनाओं के अभाव में बहुत से राजाओं के मुकुट तक चले गए और कुछ राजतंत्रों ने अपने शत्रु की युद्धक सामर्थ्य की सटीक जानकारी प्राप्त कर अनेक युद्ध जीते। सूचना के महत्व को रेखांकित करने वाला यह तो केवल एक पहलू है, जबकि जीवन के हर एक क्षेत्र में सूचना का महत्व है। समय-समय पर लोगों ने अपने विवेक और उपलब्ध संसाधनों का प्रयोग कर अपना सूचना-तंत्र विकसित किया। हमने गुप्तचरों, हरकारों और डाकियों से लेकर कबूतर, टेलीग्राम, टेलीफोन, टेलीवीजन, स्मार्ट फोन या मोबाइल और सोशल मीडिया तक का सफ़र पिछली दो-तीन शताब्दियों में पूरा किया है।
आज का युग सोशल मीडिया का युग है। किसी भी ख़बर को कुछ ही घंटों में वायरल कर दिया जाता है। सूचना का यह तीव्रतम माध्यम बन कर उभरा है लेकिन इसकी एक समस्या भी है। वो है सच का कहीं खो जाना। हमारा समाज पहले से ही अलग-अलग खाॅंचों में बॅंटा हुआ है। अतः एक वर्ग के लिए जो सच है वो दूसरे वर्ग के लिए प्रोपेगंडा बन जाता है। चौबीस घंटे लोग सूचना को अपने-अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते रहते हैं। एक तटस्थ विश्लेषण मिलना कठिन बन गया है। लोग अपने धर्म, जाति और समुदाय के हित-अहित को ध्यान में रख ख़बरों को वायरल करते हैं। अक्सर ऐसे मामले मीडिया की सुर्ख़ियों में रहते हैं जिन पर समाज की प्रतिक्रिया विभाजित होती है। हर किसी का अपना-अपना सच होता है, जबकि सच दोनों में से किसी की तरफ नहीं बल्कि कहीं बीच में होता है। सूचना की इस गलाकाट प्रतियोगिता में सच अक्सर प्रोपेगंडा के नीचे दब कर रह जाता है। सूचना के इस युग में सच की तलाश कठिन हो गई है।
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