शीर्षक : बरगद के नीचे – कविता साव पश्चिम बंगाल

सावन का महीना था, पर गाँव के तालाब का पानी आधा रह गया था। खेतों में हरियाली कम और लोगों के चेहरों पर चिंता अधिक दिखाई देती थी। गाँव के चौपाल के पास एक पुराना बरगद था। उसी के नीचे हर शाम गाँव के बूढ़े बैठकर सुख-दुःख की बातें किया करते थे।
उसी गाँव में गंगाराम नाम का एक गरीब किसान रहता था। उसकी ईमानदारी पूरे इलाके में प्रसिद्ध थी, पर गरीबी ने उसके घर का रास्ता कभी नहीं छोड़ा। पत्नी गोमती कई दिनों से बीमार थी और बेटा मोहन पढ़ना चाहता था, पर घर की हालत ऐसी थी कि दो जून की रोटी जुटाना भी कठिन था।
एक दिन खेत की मेड़ ठीक करते समय गंगाराम की कुदाल किसी कठोर वस्तु से टकराई। उसने मिट्टी हटाई तो एक पीतल का घड़ा निकला। घड़े में चाँदी के पुराने सिक्के भरे थे।
गंगाराम की आँखें चमक उठीं। एक क्षण के लिए उसे लगा कि उसकी सारी परेशानियाँ समाप्त हो गईं। तभी उसे याद आया कि यह खेत उसका नहीं, गाँव के जमींदार ठाकुर रघुवीर सिंह का है।
वह घड़ा उठाकर सीधे ठाकुर के घर पहुँचा।
ठाकुर ने आश्चर्य से पूछा, “गंगाराम, यह क्या है?”
“मालिक, आपके खेत से निकला है। इसलिए यह आपका है।”
ठाकुर कुछ देर तक उसे देखते रहे। फिर बोले, “आज पहली बार समझ आया कि धनवान वह नहीं जिसके पास धन है, धनवान वह है जिसके पास ईमान है।”
यह बात पूरे गाँव में फैल गई।
कुछ दिनों बाद तहसील से अधिकारी आए। पता चला कि वह घड़ा पुरातात्त्विक महत्व का है। सरकार ने उसे अपने संरक्षण में ले लिया। नियम के अनुसार खोज करने वाले और भूमि के स्वामी—दोनों को पुरस्कार मिला।
ठाकुर ने अपना पूरा पुरस्कार गंगाराम को देते हुए कहा, “यह धन तुम्हारी सत्यनिष्ठा का सम्मान है, दान नहीं।”
गंगाराम ने उस धन से पहले पत्नी का इलाज कराया, फिर बेटे मोहन को स्कूल भेजा। बची हुई राशि से उसने गाँव के बरगद के नीचे एक छोटा-सा पुस्तकालय बनवाया, जहाँ हर बच्चा निःशुल्क पढ़ सकता था।
उद्घाटन के दिन गाँव के एक युवक ने पूछा, “काका, आपने अपने लिए बड़ा घर क्यों नहीं बनवाया?”
गंगाराम मुस्कुराया और बोला, “बड़ा घर बनाने से आदमी बड़ा नहीं होता। बड़े विचार और अच्छे कर्म ही मनुष्य को बड़ा बनाते हैं।”
बरगद के नीचे बैठे बूढ़े यह सुनकर संतोष से मुस्कुरा उठे। उस दिन गाँव के बच्चों ने पहली बार समझा कि ईमानदारी कभी तत्काल लाभ नहीं देती, पर अंततः वही सबसे बड़ा धन बन जाती है।
संदेश:
ईमानदारी, सत्य और सदाचार का मार्ग कठिन अवश्य होता है, किंतु अंततः वही मनुष्य को सम्मान, आत्मसंतोष और समाज का विश्वास दिलाता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




