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संघर्षशील स्त्री — अदिति – कविता साव पश्चिम बंगाल

संघर्षशील स्त्री — अदिति – कविता साव
पश्चिम बंगाल

भोर का धुँधलका अभी पूरी तरह छँटा नहीं है। छोटे-से आँगन में तुलसी के पत्तों पर ओस की बूँदें चमक रही हैं। रसोई से उठती धुएँ की पतली लकीर हवा में घुल रही है। चूल्हे पर चाय खदबदा रही है और अदिति आटे से सने हाथों के बीच बार-बार अपनी साड़ी का पल्लू सँभाल रही है। माथे पर पसीने की बूँदें हैं, बालों की कुछ लटें चेहरे पर बिखरी हुई हैं और आँखें रात की अधूरी नींद का बोझ ढो रही हैं। फिर भी उसके चेहरे पर एक विचित्र शांति है—जैसे वह हर सुबह अपने भीतर एक नया सूरज उगाती हो।

अदिति की उम्र का अनुमान लगाना कठिन है। समय ने उसके चेहरे पर महीन रेखाएँ खींच दी हैं, लेकिन आँखों की चमक अब भी बुझी नहीं। साँवले चेहरे पर श्रम की आभा है। हथेलियाँ खुरदरी हैं, उँगलियों के पोरों पर काम के निशान हैं और पैरों की एड़ियों में दरारें। उसके पास न महँगे आभूषण हैं, न रेशमी वस्त्र; उसकी सादी सूती साड़ी, कसकर बँधा जूड़ा और माथे पर लगी छोटी-सी बिंदी ही उसका शृंगार हैं।

वह रसोई से निकलकर आँगन में आती है। एक हाथ से रस्सी पर सूखते कपड़े समेटती है, दूसरे हाथ से दरवाजे पर रखे दूध के बर्तन को भीतर उठाती है। तभी अंदर से किसी के पुकारने की आवाज आती है। वह क्षणभर के लिए ठिठकती है, फिर अपने कदम उस ओर मोड़ देती है। उसके चेहरे पर न झुँझलाहट है, न शिकायत। बस, होंठों पर एक हल्की-सी मुस्कान है, जो शायद उसकी आदत बन चुकी है।

लेकिन अदिति को केवल घर की चारदीवारी में मत देखिए। दोपहर के समय जब वह घर से बाहर निकलती है, तो उसके कंधे पर एक पुराना थैला होता है। उसमें कुछ कागज, एक छोटी डायरी और भविष्य के अधूरे सपने रखे हैं। धूप सड़क पर आग बरसा रही होती है। लोग छाया की तलाश में तेजी से कदम बढ़ाते हैं, लेकिन वह अपने कदमों की गति नहीं बदलती। उसके माथे पर पसीना चमकता है, फिर भी उसकी दृष्टि सामने टिकी रहती है। रास्ते की कठिनाइयाँ उसे रोकती नहीं, केवल उसकी चाल को और दृढ़ बना देती हैं।

अदिति के चलने का ढंग भी अनोखा है। वह न सिर झुकाकर चलती है, न किसी को चुनौती देने के लिए ठोड़ी ऊँची करती है। उसका सिर सहज गरिमा से उठा रहता है। किसी की कटु बात सुनकर उसकी भौंहें क्षणभर के लिए तन जाती हैं, आँखों में एक चमक उभरती है, फिर वह गहरी साँस लेकर आगे बढ़ जाती है। उसके मौन को लोग कभी-कभी कमजोरी समझ लेते हैं, पर उसकी आँखों में झाँकने वाला जान सकता है कि यह मौन विवशता का नहीं, विवेक का है।

संध्या को घर लौटते समय उसके कदमों में थकान उतर आई होती है। वह दरवाजे की चौखट पर कुछ पल ठहरती है। थैले को एक ओर रखकर अपने माथे का पसीना पोंछती है। आकाश में डूबते सूरज की लालिमा उसके चेहरे पर पड़ती है। उस क्षण उसकी आँखों के नीचे की कालिमा, माथे की झुर्रियाँ और थके हुए कंधे उसकी दिनभर की यात्रा का पूरा वृत्तांत कह देते हैं। फिर भी जैसे ही कोई परिचित आवाज उसे पुकारती है, उसके चेहरे पर अपनत्व की उजली रेखा खिंच जाती है।

रात में सबके सो जाने के बाद अदिति का एक दूसरा रूप दिखाई देता है। कमरे के कोने में रखी छोटी-सी मेज पर पीली रोशनी वाला दीपक जल रहा है। वह उसके सामने बैठी अपनी डायरी खोलती है। दिनभर की भागदौड़ से थकी उँगलियाँ अब कागज पर धीरे-धीरे चलती हैं। कभी वह कुछ लिखती है, कभी रुककर खिड़की के बाहर अँधेरे को देखती है। उसके चेहरे पर उस समय न गृहस्थी की व्यस्तता है, न दूसरों की अपेक्षाओं का दबाव। वहाँ एक स्वतंत्र चेतना है, जो अपने लिए भी कुछ सोचती है, कुछ चाहती है और कुछ रचने का साहस रखती है।

उसकी डायरी के पन्नों पर शायद कोई बड़ी घोषणा नहीं लिखी जाती। वहाँ छोटे-छोटे संकल्प हैं—अपने पैरों पर खड़े होने के, अपनी पहचान बनाने के, अपने भीतर की प्रतिभा को व्यर्थ न जाने देने के। अदिति जानती है कि जीवन ने उसे सहज रास्ते नहीं दिए, लेकिन वह अपने रास्तों की कठिनाई को अपनी नियति मानकर बैठने को भी तैयार नहीं।

अदिति को देखते हुए लगता है, जैसे मिट्टी का कोई दीपक आँधियों के बीच जल रहा हो। लौ कभी काँपती है, कभी छोटी पड़ जाती है, मगर उसके भीतर का तेल अभी शेष है। उसकी आँखों में आँसू आ सकते हैं, आवाज भर्रा सकती है, कदम थक सकते हैं—पर उसके व्यक्तित्व में एक ऐसी दृढ़ता है, जो उसे फिर उठ खड़ा होने की प्रेरणा देती है।

वह कोई असाधारण वेशभूषा वाली नायिका नहीं, न ही उसके पीछे प्रशंसा करने वालों की भीड़ है। वह तो हमारे आसपास की वही स्त्री है, जो सुबह सबसे पहले जागती है और रात में सबसे अंत में सोती है; जो जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों के लिए भी थोड़ी-सी जगह बचाकर रखती है; जो कठिनाइयों से गुजरते हुए भी अपने भीतर की कोमलता को मरने नहीं देती।

अदिति का वास्तविक सौंदर्य उसके चेहरे पर नहीं, उस अदृश्य संकल्प में है, जो उसकी थकी हुई आँखों को भी अगली सुबह की प्रतीक्षा करना सिखाता है। वह संघर्ष को आभूषण बनाकर नहीं पहनती; वह उसे जीवन की राह पर चलते हुए जीती है। उसके खुरदरे हाथ, पसीने से भीगा माथा, दृढ़ कदम और रात के एकांत में डायरी पर झुका चेहरा—यही उसके व्यक्तित्व का सजीव चित्र हैं।

उसे देखकर मन अनायास कह उठता है—यह स्त्री केवल जीवन का बोझ उठाने के लिए नहीं बनी; वह अपने जीवन को आकार देने की क्षमता भी रखती है। उसके भीतर एक पूरा आकाश है, और वह उस आकाश तक पहुँचने के लिए अब भी चल रही है।

अदिति केवल एक नाम नहीं, उन अनगिनत स्त्रियों का प्रतिबिंब है, जो अपनी थकान को मुस्कान के पीछे छिपाकर नहीं, अपने साहस के सहारे जीवन की राह तय करती हैं। उसके जीवन का संघर्ष उसकी पहचान अवश्य है, लेकिन उसकी नियति नहीं। वह अपने वर्तमान की कठिन जमीन पर खड़ी होकर भी भविष्य के आकाश को देखती है।

और शायद यही अदिति की सबसे बड़ी विशेषता है—वह परिस्थितियों से हारकर अपने अस्तित्व को छोटा नहीं करती, बल्कि अपने आत्मविश्वास से जीवन का अर्थ बड़ा कर देती है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल

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