लघुकथा: विश्वासघात कहानीकार: राजेश कुमार ‘राज’

लघुकथा: विश्वासघात
कहानीकार: राजेश कुमार ‘राज’
इमरान आज बहुत ख़ुश था। आज वह 10 साल बाद दुबई से हिंदुस्तान अपने घर जा रहा था। पत्नी और भाई से मिलने की अनूभूति भर से उसके शरीर में झुरझुरी पैदा हो रही थी। वह 10 साल पहले के उस समय को याद करता है जब उसका और सलमा का निकाह हुआ था। घर के माली हालात अच्छे नहीं थे। अपने निकाह और वलीमा के लिए इमरान ने पचास हजार रुपए महाजन से सूद पर उधार लिए थे। लगा-बंधा रोज़गार न होने की वजह से वह उधारी चुकता नहीं कर पा रहा था। इसलिए उसके मूल पर सूद लगने से देनदारी बढ़ती जा रही थी। भाई सलमान की पढ़ाई का ख़र्चा भी निकालना मुश्किल हो रहा था। इसी बीच शहर से उसका एक दोस्त आया। इमरान ने उसे अपने हालात बताए। उसकी मजबूरी देख उस दोस्त ने एक एजेंट के मार्फत दुबई में उसके लिए एक अदद नौकरी का इंतजाम कर दिया। सलमा और भाई को पीछे छोड़ कर वह दुबई चला गया। वह दुबई से अपने परिवार को पैसा भेजने लगा। पहले-पहल वह दो-तीन बार घर भी आया। सलमा और सलमान ने उसका बहुत ध्यान रखा। बाद में उसका आना-जाना और पैसे भेजना बंद हो गया।
इमरान दिल्ली के हवाई अड्डे पर उतरा और टैक्सी पकड़ कर अपने गाॅंव के लिए निकल पड़ा। उसका दिल ख़ुशी से झूम रहा था। अपने घर पहुॅंच कर उसने दरवाजे पर दस्तक दी। उसके भाई सलमान ने दरवाजा खोला। सलमा ने भी दुआ-सलाम की। लेकिन सलमा सकुचा रही थी और उस से ऑंखें नहीं मिला रही थी। उसने कारण पूछा तो उसके भाई सलमान ने सकुचाते हुए जवाब दिया कि उसकी कोई ख़ैर-ख़बर न होने के कारण उसके और सलमा के बीच नज़दीकियाॅं आ गई थीं। उसने आगे कहा, “भैया! आप सलमा को तलाक दे दीजिए ताकि हम दोनों निकाह कर सकें।” इमरान को कुछ भी सूझ नहीं रहा था। वह ठगा सा दोनों को बस देखता रहा। पत्नी और भाई के विश्वासघात ने उसे अंदर तक तोड़ दिया था।
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