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ईर्ष्या– शिखा खुराना नई दिल्ली

स्नेहा और हरलीन बचपन की सहेलियां थीं। दोनों ने स्कूल पास करने के बाद एक ही कालेज में एडमिशन लिया था। दोनों सखियां कालेज की रौनक थीं। दोनों पढ़ाई में अव्वल और डांस ड्रामा में भी इनका कोई सानी नहीं था। समय पंख लगाकर उड़ रहा था। हरलीन को अच्छी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी से विदेश भेजा जा रहा था। अच्छी नौकरी पाने के लिए स्नेहा का संघर्ष अभी भी जारी था। हरलीन चाहती थी स्नेहा को भी कोई अच्छी नौकरी मिल जाए तो दोनों विदेश जाने का ख्वाब भी साथ साथ पूरा कर सकें। स्नेहा हरलीन के लिए खुश तो थी, पर खुद को नौकरी ना मिलने की वजह से हरलीन से अपनी तुलना करने लगी थी। वो किसी भी दृष्टि से हरलीन से कभी किसी क्षेत्र में पीछे नहीं रही थी। फिर किस्मत ने हरलीन को इतनी अच्छी नौकरी और विदेश जाने के लिए क्यों चुना और उसे अभी तक एक अच्छी नौकरी भी नहीं मिल पाई।

हरलीन का विदेश जाने का समय निकट था। दोनों सखियां बहुत उदास थीं। हरलीन ने अगले इतवार का सारा दिन स्नेहा के साथ बिताने का प्रोग्राम बनाया।
हरलीन ने खाना आर्डर किया था और डिलिवरी लेने दरवाज़े पर जाने से पहले उसने कुछ जरूरी कागजात, फ्लाइट टिकट और पासपोर्ट स्नेहा को एक फोल्डर में डालने को दिये और उन्हें उसके बैग में रखने को कहा। ये हरलीन के ज्वाइनिंग के पेपर और आफर लेटर आदि थे। इसी फोल्डर में हरलीन का पासपोर्ट भी था। देर रात तक दोनों सखियां बतियाती रहीं और स्नेहा वहीं हरलीन के साथ ही सो गई। सुबह स्नेहा की नींद खुली तो हरलीन अभी भी सो रही थी। स्नेहा ने अपना बैग उठाया बाहर आकर गाड़ी स्टार्ट करके घर की ओर निकल गई।

हरलीन भी उठने पर अपनी पैकिंग में व्यस्त हो गई। अगली सुबह हरलीन सब सामान और पेपर्स संभाल रही थी तो उसे अपना फोल्डर नहीं मिल रहा था जिसमें उसके सारे कागजात और पासपोर्ट भी था। स्नेहा बहुत परेशान थी। अभी कि उसके पास डिजिटल पासपोर्ट और पेपर्स थे। फिर भी ओरिजिनल तो चाहिए ही थे। हरलीन ने स्नेहा को फोन करके पूछा तो स्नेहा ने कहा कि पेपर्स बैग में ही रखे थे। हरलीन कभी भी अपनी प्रिय सखी पर संदेह नहीं कर सकती थी तो उसे लगा कि शायद उसने ही बैग से निकाल कर कहीं संभाल दिये होंगे और हड़बड़ी में याद नहीं कर पा रही कि कहां रखे हैं। फ्लाइट के कुछ घंटे ही बचे थे और हरलीन का रो रोकर बुरा हाल था। तभी स्नेहा लगभग दौड़ती हुई आई और वो फोल्डर उसके हाथ में था। अपनी प्रिय सखी के गले लगकर रो पड़ी और माफी मांगने लगी। मैं ईर्ष्या में अंधी होकर तेरे भविष्य से खिलवाड़ करने जा रही थी। हो सके तो मुझे माफ़ कर दे हरलीन। हरलीन ने बिना किसी शिकायत के अपनी जान से भी प्यारी सखी के ह्रदय की स्थिति को समझते हुए उसे गले लगा लिया। स्नेहा अपने कृत्य पर बहुत शर्मिन्दा थी और बार बार सबसे माफी मांग रही थी। हरलीन ने गले लगकर उसका माथा चूम लिया और सारे गिले-शिकवे भुलाकर विदा हुई।
शिखा खुराना
नई दिल्ली

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