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ऋषि-कन्या और राजा :⁠- दुष्यंत-शकुंतला की अनोखी प्रेम-कथा – नरसा राम जांगु डीडवाना_कुचामन

 

जहाँ पहली नज़र में ही दिल धड़क उठे, वो प्रेम था इनका।
न महल था, न दास-दासी, फिर भी रानी बना दी गई एक वन की बेटी।
एक अँगूठी खोई, और साथ में खो गई यादें… पर सच्चा प्यार लौट कर आया।

बहुत पुरानी बात है। हस्तिनापुर के राजा दुष्यंत एक दिन शिकार खेलते-खेलते महर्षि कण्व के आश्रम में पहुँच गए। गर्मी बहुत थी, प्यास लगी थी। आश्रम में उन्हें पानी पिलाने आई एक बहुत ही सुंदर लड़की। नाम था शकुंतला।

शकुंतला ऋषि कण्व की पाली हुई बेटी थी। असल में वो अप्सरा मेनका और ऋषि विश्वामित्र की बेटी थी, जिसे जन्म के बाद जंगल में छोड़ दिया गया था। शकुंत नाम की चिड़ियों ने उसकी रक्षा की, इसलिए उसका नाम शकुंतला पड़ा। वो फूलों-पौधों के बीच पली-बढ़ी, सीधी-सादी और भोली थी।

पहली मुलाकात और प्यार
दुष्यंत ने शकुंतला को देखा तो देखते ही रह गए। शकुंतला भी जवान राजा को देखकर शरमा गई। दोनों की आँखें मिलीं और बिना कुछ कहे ही दिल जुड़ गए। दुष्यंत ने अपना परिचय दिया। कुछ दिन वो आश्रम में ही रुक गए। दोनों साथ में पेड़-पौधों को पानी देते, हिरनों के साथ खेलते। धीरे-धीरे दोस्ती प्यार में बदल गई।

गंधर्व विवाह
उस ज़माने में एक तरीका होता था ‘गंधर्व विवाह’ – जिसमें लड़का-लड़की अपनी मर्ज़ी से एक-दूसरे को अपना लेते थे, बिना बड़े रीति-रिवाज के। दुष्यंत और शकुंतला ने भी वन-देवताओं को साक्षी मानकर एक-दूसरे को पति-पत्नी मान लिया। राजा ने शकुंतला को अपनी शाही अँगूठी दी और वादा किया, “मैं अभी राजधानी जाता हूँ। कुछ दिनों में तुम्हें सम्मान के साथ लेने आऊँगा।”

दुर्वासा का श्राप
राजा के जाने के बाद शकुंतला बस उसी के ख्यालों में खोई रहती। एक दिन गुस्सैल ऋषि दुर्वासा आश्रम आए। शकुंतला दुष्यंत की यादों में इतनी खोई थी कि उसे पता ही नहीं चला। दुर्वासा को लगा उनका अपमान हुआ। गुस्से में उन्होंने श्राप दे दिया: “जिसके ध्यान में तू मुझे भूल गई, वो तुझे भूल जाएगा।”

शकुंतला की सहेलियाँ घबरा गईं। मिन्नतें करने पर ऋषि थोड़ा पिघले और बोले, “अगर कोई निशानी दिखाएगी, तो राजा को सब याद आ जाएगा।”

बिछड़ना और पहचान
कुछ समय बाद शकुंतला गर्भवती हुई। ऋषि कण्व लौटे तो उन्होंने शकुंतला को दुष्यंत के पास भेजा। रास्ते में नदी पार करते समय शकुंतला की अँगूठी पानी में गिर गई।

जब शकुंतला राजमहल पहुँची, तो श्राप के कारण दुष्यंत उसे पहचान ही नहीं पाए। उन्होंने साफ मना कर दिया, “मैं तुम्हें नहीं जानता।” शकुंतला के पास सबूत के लिए अँगूठी भी नहीं थी। रोती-बिलखती शकुंतला को उसकी माँ मेनका आकाश में उठा ले गई।

मिलन
कुछ दिन बाद एक मछुआरे को मछली के पेट से वो अँगूठी मिली। वो राजा के पास ले गया। अँगूठी देखते ही दुष्यंत को एकदम सब याद आ गया। उन्हें बहुत पछतावा हुआ। वो पागलों की तरह शकुंतला को ढूँढने लगे।

आखिर में देवताओं की मदद से राजा दुष्यंत की मुलाकात शकुंतला और अपने बेटे भरत से हुई। भरत वही बच्चा था जिसके नाम पर हमारे देश का नाम ‘भारत’ पड़ा।

इस तरह तमाम मुश्किलों के बाद दो दिल फिर से मिल गए। यही है दुष्यंत और शकुंतला की प्रेम कहानी।

नरसा राम जांगु
डीडवाना_कुचामन

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