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आलेख : अहंकार पर विनम्रता की विजय – पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

आज के इस भौतिकवादी प्रगतिशील युग में आम आदमी दिखावे की ओर अग्रसर होता हुआ अपनी वैभवता,
धनाढ्यता का प्रदर्शन करते हुए प्रतिस्पर्धा की दोड़ में अहंकार की सीढ़ियां छू रहा है। वहीं सादगी पूर्ण मानव, संस्कारों से भरा हुआ विनम्रता की प्रतिमूर्ति नेक विचारों अच्छी सोच के साथ सभी को सकारात्मक सीख दे रहा है। सब कुछ होते हुए भी वह हमेशा अपने को साधारण मानव कहते हुए अपनी यथाशक्ति से तन मन धन से हर सकारात्मक कार्य के सहयोग के लिए हाजिर रहता है। वही अहंकारी व्यक्ति जिस पर अपना कुछ भी नहीं है कर्ज में डूबा हुआ कर्ज के काल में डुबकी लगाते हुए विनाश की ओर अग्रसर है। वह सेजन के पेड़ के समान है,क्यों कि वह फल आने पर इतनी तेजी से उड़ता है कि जड़ से ही खत्म हो जाता है। उसका नामो निशा मिट जाता है।सादगी आम के वृक्ष की तरह है वह जब फलता है तो नम्रता से उसकी डालें जमीन पर झुक जाती है और अहंकार सेजन के पेड़ की तरीके से है जो फल आने पर अपने मद में चूर होकर उड़ता है जड़ से ही खत्म हो जाता है।ईश्वर कहते है अहंकार नाव के पेंदे में एक छेद के समान होता है।यह चाहे छोटा हो या बड़ा एक ना एक दिन नाव को डुबा देता है।धन और ताकत भी बड़ी नशीली चीज है।क्योंकि कम हो तो मजबूर कर देती है और ज़्यादा हो तो मगरूर बना देती हैं।अहंकार की मुठ्ठी बांध कर कुछ भी प्राप्त नहीं हो सकता यदि कुछ प्राप्त करना ही हो तो समर्पण की अंजली बनाकर ही कुछ प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए सादगी विनम्रता का प्रतिरूप है।अहंकार विनाशकारी है।आदमी को कभी भी अपने वैभव पर गुमान नहीं करना चाहिए लक्ष्मी चलाए मान है। सादगी इंसानियत को जन्म देती है।अहंकार वैमनस्यता को बढ़ावा देता है। हमेशा सादगी का व्यवहार करे सादा जीवन उच्च विचार को ही जीवन का सिद्धांत माने इसी में सब की भलाई है।अहंकार काले विनाश है।जो आदमी को नस्तेनाबूत कर देता हैं।मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूंजी है उसके अच्छे विचार क्योंकि
धन और बल किसी को भी गलत राह पर ले जा सकता है किंतु अच्छे विचार सदैव ही अच्छे कार्यों के लिए ही प्रेरित करेंगे।परफेक्ट टाइम कभी नहीं आता जो टाइम है उसे ही परफेक्ट बनाना पड़ता है।धन को एकत्रित करना सरल है संस्कारों को अर्जित करना कठिन धन को लूटा जा सकता है पर संस्कारों के लिए समर्पित होना पड़ता है।

“विनम्रता का बन पुजारी सादगी स्वीकार कर,
अंहकार से दूर रह सभी जन को प्यार कर।”

पालजीभाई राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)

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