बरसात प्रलय बनकर उभरी थी – शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’

बरसात उस वर्ष जैसे प्रलय बनकर उतरी थी। देखते ही देखते गांव की गलियां, खेत, घर और मवेशी सब उफनती नदी में समा गए। चारों ओर केवल पानी ही पानी दिखाई देता था। लोग अपनी जान बचाने के लिए ऊंचे स्थानों की ओर भाग रहे थे। कई परिवार बिछड़ चुके थे।
प्रमोद अपने टूटे हुए घर की छत पर अकेला पड़ा था। भूख और प्यास से उसका शरीर निढाल हो चुका था। कितने दिन बीत गए थे, उसे स्वयं भी याद नहीं था। कभी वह सहायता के लिए आवाज लगाता, कभी बेहोशी में गिर पड़ता। दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं देता था। अब उसे लगने लगा था कि मृत्यु उससे बस कुछ ही कदम दूर है।
अचानक उसे लगा जैसे किसी ने उसके कंधे को धीरे से थपथपाया हो। उसने बड़ी मुश्किल से आंखें खोलीं। सामने सोनी खड़ी थी। उसके हाथ में पानी की बोतल थी और आंखों में चिंता।
“प्रमोद,,,,पानी पी लो,” उसने धीमे स्वर में कहा।
सोनी ने अपने हाथों से उसे पानी पिलाया। फिर राहत दल के कर्मचारियों की सहायता से उसे नाव तक लाया गया। प्रमोद अर्धचेतन अवस्था में था। उसे अस्पताल पहुंचाया गया। कई दिनों तक उसका इलाज चलता रहा। इस पूरे समय सोनी अस्पताल में उसके पास रही। उसने दिन-रात उसकी सेवा की, दवाइयों का ध्यान रखा और हर कठिनाई में उसका साथ दिया।
धीरे-धीरे प्रमोद स्वस्थ होने लगा।
एक दिन अस्पताल से छुट्टी मिलने पर सोनी ने शांत स्वर में पूछा,
“अब क्या सोच रहे हो? कहां जाओगे?”
इतना सुनते ही प्रमोद की आंखें भर आईं। वह अचानक बिस्तर से उतरकर सोनी के पैरों में गिर पड़ा। उसका गला रुंध गया।
“मुझे माफ़ कर दो सोनी, मैं बहुत बड़ा अपराधी हूं तुम्हारा,” वह बिलखते हुए बोला।
उसके सामने अतीत चलचित्र की तरह घूमने लगा। सोनी उसकी पत्नी थी। सरल, सहनशील और समर्पित। लेकिन प्रमोद ने कभी उसके प्रेम और त्याग की कद्र नहीं की। छोटी-छोटी बातों पर उसे अपमानित करता, कठोर शब्द कहता और एक दिन क्रोध में आकर उसे घर से निकाल दिया था।
उस दिन सोनी चुपचाप चली गई थी। उसने न कोई शिकायत की, न बदला लेने की कोशिश। उसने अपने आत्मसम्मान के साथ नया जीवन शुरू कर दिया था।
और आज वही सोनी, जिसने उसके कारण इतना अपमान सहा था, उसकी जीवनरक्षक बनकर सामने खड़ी थी।
प्रमोद रोते हुए बोला,
“जिसे मैंने ठुकरा दिया, उसी ने अपना सबकुछ भूलकर मेरी जान बचाई। मैं तुम्हारे इस ऋण को कभी नहीं चुका सकता।”
सोनी ने उसे उठाया और शांत स्वर में कहा,
“समर्पण का अर्थ बदला लेना नहीं, बल्कि अपने रिश्तों की मानवता को बचाए रखना है। यदि मैं भी तुम्हारी तरह कठोर बन जाती, तो शायद आज तुम्हें खो देती।”
प्रमोद निःशब्द था। बाढ़ ने उसका घर, धन और अभिमान सब बहा दिया था, लेकिन उसी विनाश के बीच उसे समर्पण और सच्चे प्रेम का अर्थ समझ आ गया था।
शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’




