“अनुगामिनी” दूसरा भाग _ डॉ डिम्पल सैनी
खींच दी लक्ष्मण रेखा गाँव की सीमा पर
डाल दी मर्यादा की बेड़ियाँ
खड़ी की दीवार ऊंच-नीच की
घेरा कायदों की दहलीज़ से
अब कहते हो स्त्रियाँ
“यात्रा-संस्मरण” क्यों नही लिखती .??.
लिहाज़ के काजल आँखों में अंजवाए
हया की सुर्खी गालों पे मलवा कर
खामोशी की ललाई होठों पर सजवा
अब कहते हो स्त्रियाँ “क्रांति” क्यों नही लिखती ….??
उसने प्रेम की उन्मुक्तता लिखी ,
वर्जनाओं की लक्ष्मण रेखा लांघी
बिल्कुल “खुशवंत” की तरह
तुमने उसे “तस्लीमा” की बेहयाई कहा ।
उसने “नास्तिकता” का दर्शन लिखा ,
सवाल किए ईश्वर के अस्तित्व पर
अरस्तू की तरह तुमने “अरुंधति” की कुमति कहा.।
महादेवी ,शिवानी या मन्नू भंडारी बन
लिखती आयी झरोखों से दिखती दुनिया
आँगन के किरदारों के आख्यान,
चाहे डाल में फुदकती “गिल्लू” या
फिर रसोईदार “भक्तिन” की कथा
“कृष्णकली” की भीगी प्रेम कहानी
“पूतों वाली” का दारुण किस्सा
या “बंटी” के बालमन की कुंठाए
सदियों कहते रहोगे तुम “औरतें”
यायावर नही होती
कैसे रचे फक्कड़ घुमन्तु कहानियाँ
सफर में अय्यारों के भय से…
वो रचेगी हमेशा एकांत का साहित्य
भावनाओं में नम कहानियाँ
रिश्तों में मिली पीड़ा की कविता
कुनबे से विद्रोह का राग जो बनी थी
गार्गी, महादेवी ,तस्लीमा या बेबी हलदार
याद रखना उन सभी ने छोड़ा था सबसे पहले “अनुगामिनी” होने की शर्त……..।
डॉ- डिम्पल सैनी




