लघुकथा— “कठपुतली का खेल” – नरेंद्र त्रिवेदी(भावनगर-गुजरात)

अनुपने कहा, ‘सोनल आज हम कठपुतली का खेल देखने जाएंगे, जो हमारे समाज में एक कठिन और आदर्श खेल है।’
‘अनूप वह किस प्रकार का खेल है? मैंने आज ही नाम सुना।’
‘सोनल तू शहर में पले-बढ़ी हैं इसलिए तुम्हे वो खेल के बारे में कुछ पता नही है।’
सोनलने कहा,’मम्मी पापा आप भी आ जाओ हम सब खेल देखने चलेंगे.’ सोनल ने अपनी सास की ओर देखते हुए कहा.
‘हाँ, हाँ हम सब चलेंगे।’
सोनल रुचि से कठपुतली कलाकार जो मांडवा का निर्माण कर रहा था वो देख रही थी। वह डोरी और कठपुतली की व्यवस्था को व्यवस्थित होते हुए देख रही थी। अनुप ने सोचा कि सोनल को इस कठिन कठपुतली खेल में जरूर मजा आएगा।
देर रात कठपुतली का खेल देखने के बाद सभी लोग घर आये और ड्राइंग रूम में बैठकर खेल के विषय में बातें कर रहे थे।
अनुप ने सोनल से पूछा, ‘सोनल कठपुतली का खेल कैसा लगा।’
सोनल ने कहा कि ‘कोई खास बात नहीं थी। मां हमें कठपुतली की तरहा हररोज नचाती है , जैसे कठपुतली वाला कठपुतली को डोरी से बांध कर नचाता था। अनूप अंतर यह है कि कठपुतली वाला व्यक्ति सार्वजनिक रूप से कठपुतली का नृत्य दिखता था और माँ अकेले में कठपुतली की तरहा हमे नचाती है।
सोनल की बात सुन के ड्राइंग रूम में सब स्तब्ध हो गए। सोनल के ससुर और बाकी सभी लोग मंद मंद मुस्कान के साथ अपने कमरे में चले गये।
नरेंद्र त्रिवेदी(भावनगर-गुजरात)




