लघुकथा : “उम्मीद” – मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

अविनाश के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ साफ पढ़ी जा रही थी। बाढ़ का भारी प्रकोप उसके घर की तरफ तेजी से बढ़ रहा था। मदद की दूर-दूर तक कोई सुविधा नज़र नहीं आ रही थी। उसने अपने करीबी लोगों को फोन मिलाना चाहा, लेकिन किसी ने मदद का हाथ नहीं बढ़ाया।
कुछ क्षणों के लिए उसका मन टूट-सा गया, लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। घर की छत पर सफेद झंड़ी का संकेत दिया और मोबाइल की बची हुई बैटरी से प्रशासन के आपदा नियंत्रण कक्ष में अपनी लोकेशन भेज दी।
कुछ ही देर में राहत दल की नाव वहाँ पहुँची। उसके परिवार के साथ-साथ आसपास फँसे कई लोगों को भी सुरक्षित निकाल लिया गया। शिविर में पहुँचकर अविनाश ने राहतकर्मियों का धन्यवाद किया। अगले ही दिन वह स्वयं भी राहत सामग्री बाँटने वालों की टोली में शामिल हो गया।
उसे समझ आ गया था कि विपत्ति केवल सहायता माँगना नहीं सिखाती, बल्कि किसी और की सहायता करने का अवसर भी देती है।
“आपदा इंसान की परीक्षा लेती है, और सेवा उसे इंसान से महान बना देती है।”
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’




