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दहेज प्रथा का शोषण – डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी स्वरचित मौलिकआलेख

 

आधुनिक शिक्षित नारी फिर भी दहेज प्रथा का शोषण क्यों?

नारीआज के युग में कंधे से कंधा मिलाकर पुरुषों के साथ चल रही है। किंतु आज भी नारी दहेज प्रथा और शोषण का शिकार निरंतर होती जा रही है।
संस्कार संस्कृति और मर्यादा की परिपाटी में बंधी हुई लड़कियां शोषण के विरुद्ध आवाज नहीं उठाती हैं।
अपने माता-पिता की प्रतिष्ठा बचाने के लिए ससुराल में मान सम्मान की खातिर दहेज की अनुचित मांगों को चुपचाप सहती चली जाती हैं।
शिक्षित डिग्रियां होने के बाद भी नौकरी में अपना कैरियर बनाती हुई आर्थिक मामले में वह हमेशा कमजोर ही रहती है, क्योंकि पैसा होने के बाद भी वह पति प्रधान समाज की बात ध्यान में रखते हुए सब कुछ चुपचाप सहन करती रहती है, इस कारण उनके साथ अत्याचार और अन्य होते रहते हैं।
दहेज प्रताड़ना और घरेलू हिंसा के लिए सरकारी कानून नियम तो बनाए गए , शक्ति के साथ उनका परिपालन नहीं किया जाता है, समाज की बदनामी के डर से या कोर्ट कचहरी के चक्कर लगाने के डर से ,लड़कियां अपने माता-पिता को ससुराल में होने वाले शोषण को दर्शाती नहीं है। ना बताती है माता-पिता भी सुनकर चुप रह जाते हैं क्योंकि वह पर्दाफाश करना अपनी बदनामी समझते हैं।

शिक्षा केवल शिक्षित ही नहीं करती बल्कि अपने मौलिक अधिकारों के प्रति सजगता भी लाती है। आधुनिक शिक्षित नारी को सशक्त होकर के अपने अधिकार कर्तव्य के प्रति लड़ना होगा।
सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन करते हुए दहेज मांगने वालों के प्रति कड़ीकार्यवाही।
माता-पिता को अपनी बेटी का बराबर साथ देना होगा। समाज की सोच में सकारात्मक बदलाव लाना होगा तभी यह संकट हटेगा।

डॉ मीरा कनौजिया काव्यांशी
स्वरचित मौलिकआलेख

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