शीर्षक: जमींदारी (लघुकथा) – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

एक गाँव में एक कठोर जमींदार रहता था। वह किसानों से अधिक लगान वसूलता और उनकी परेशानियों की कभी परवाह नहीं करता था। गरीब किसान दिन-रात मेहनत करते, फिर भी उनका जीवन अभावों में बीतता था। एक वर्ष भयंकर सूखा पड़ा। खेतों में फसल नहीं हुई और किसानों के सामने भूख का संकट खड़ा हो गया। इसके बावजूद जमींदार ने लगान माफ करने से इनकार कर दिया।
जब जमींदार ने स्वयं गाँव की बदहाली देखी, तो उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने किसानों का लगान माफ कर दिया, बीज और अनाज की व्यवस्था कराई तथा उनकी सहायता की। किसानों ने भी नई आशा के साथ फिर से खेती शुरू की। कुछ समय बाद गाँव फिर से खुशहाल हो गया।
इस घटना से जमींदार ने समझा कि धन और अधिकार से अधिक मूल्यवान दया, न्याय और मानवता होती है। दूसरों के दुख को समझना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है।
सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




