‘कारगिल: पत्थरों के सीने पर लिखी अमर गाथा: शून्य से नीचे की शीतलता और शहादत की उष्णता’

कारगिल केवल एक भौगोलिक मानचित्र का नाम नहीं है, बल्कि यह भारत के हर नागरिक के सीने में धड़कने वाला वह स्वाभिमान है, जो दुर्गम पहाड़ियों की ठंडी हवाओं में भी देशप्रेम की उष्णता भर देता है। जब हम द्रास की इन खुरदरी चट्टानों पर खड़े होते हैं, तो हवाएं हमें उन वीर सपूतों की पदचाप का एहसास कराती हैं, जिन्होंने अपने प्राणों की आहुति देकर तिरंगे को हमेशा के लिए गगनचुंबी बना दिया।
आजका यह विजय दिवस महज़ एक उत्सव नहीं है, बल्कि उन अनगिनत माताओं के सूने आंचल और सुहागिनों के उजड़े सिंदूर के प्रति एक मौन प्रणाम है। यहाँ हर पत्थर एक कहानी कहता है, और हर दर्रा माँ भारती के अमर सपूतों के शौर्य की गवाही देता है।
जब मैंने कारगिल की ओर क़दम बढ़ाया, तो मन में एक अजीब सी सिहरन और असीम सम्मान का भाव था। श्रीनगर से लेह की ओर जाने वाला यह मार्ग जितना सुंदर है, उससे कहीं अधिक सैनिकों के पराक्रम से पवित्र हुआ तीर्थस्थल है।
द्रास वॉर मेमोरियल (विजय दीवार): मेरी यात्रा की शुरुआत कारगिल युद्ध के केंद्र-बिंदु द्रास से हुई। यहाँ स्थित वॉर मेमोरियल के प्रवेश द्वार पर पहुँचते ही वातावरण में एक अजीब सी ख़ामोशी छा जाती है। लाल पत्थरों से बनी ‘विजय दीवार’ पर अंकित हमारे शहीदों के नाम पढ़कर आँखें नम हो जातीं हैं। हर नाम एक ऐसी कहानी है जिसने अपनी जवानी देश के नाम पर कुर्बान कर दीं।
दूर क्षितिज पर खड़ी टाइगर हिल और तोलोलिंग की पहाड़ियों को देखकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। यह कल्पना करना भी कठिन है कि कैसे हमारे सैनिकों ने शून्य से नीचे के तापमान (-40°C से -50°C) और दुश्मन की गोलियों की बौछार के बीच इन सीधी खड़ी चट्टानों पर चढ़कर तिरंगा फ़हराया था। जब मैं उस भूमि पर खड़ी थी ,जहाँ परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने अदम्य साहस का परिचय देते हुए “ये दिल मांगे मोर!” कहा था, तो दिल गर्व से भर उठा। वहाँ तैनात एक सैनिक ने हमें बताया कि कैसे हमारे जवानों ने दुश्मन के हर नापाक मनसूबों को अपनी छाती पर गोलियां खाकर नेस्तनाबूद कर दिया।
कारगिल से लौटने के बाद भी द्रास की हवाएँ मेरे कानों में गूंजतीं रहतीं हैं। यह यात्रा केवल एक पर्यटन नहीं, बल्कि मेरी आत्मा का पुनर्जागरण थी। हम आज जो खुलीं हवा में सांस ले रहे हैं, उसके पीछे किसी का बेटा, किसी का भाई और किसी का पिता सियाचिन और कारगिल की बर्फीली हवाओं में शहीद हुआ है।
कारगिल विजय दिवस हमें यह याद दिलाता है कि स्वतंत्रता का मूल्य बहुत भारी होता है, और इसे सुरक्षित रखना हमारा सबसे बड़ा राष्ट्रीय कर्तव्य है। जय हिंद! जय भारत!
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




