कोल्हू का बैल – डॉ संजीदा खानम शाहीन

गाँव में एक तेली रहता था। उसके पास एक मोटा-तगड़ा बैल था। तेली रोज सुबह बैल की आँखों पर पट्टी बाँधता और उसे कोल्हू में जोत देता। बैल दिनभर गोल-गोल घूमता। कोल्हू चलता, सरसों पिस्ती और तेल निकलता।
बैल बहुत मेहनती था। वो सोचता था कि चलने से शायद वो कहीं पहुँच जाएगा। पर शाम को जब पट्टी खुलती तो वो देखता कि वो वहीं का वहीं है – उसी कोल्हू के चारों ओर।
एक दिन बैल थक कर बोला, “मालिक, मैं सुबह से शाम तक चलता हूँ, फिर भी आगे नहीं बढ़ता। ऐसा क्यों?”
तेली हँसा और बोला, “मूर्ख बैल! तू कोल्हू का बैल है। तेरा काम बस घूमना है। आगे-पीछे सोचना तेरा काम नहीं।”
ये सुनकर बैल उदास हो गया। उसने सोचा, “अगर मैं आँख बंद करके ऐसे ही घूमता रहा तो पूरी ज़िन्दगी यहीं निकल जाएगी।”
अगले दिन उसने एक तरकीब सोची। जब पट्टी बँधी तो उसने धीरे-धीरे चलना शुरू किया। साथ-साथ वो आसपास देखता, सीखता। कुछ दिन बाद तेली ने देखा कि बैल अब सिर्फ कोल्हू ही नहीं चलाता, वो सामान भी ढो लेता है, खेत भी जोत लेता है।
तेली खुश हुआ और उसने बैल की पट्टी हमेशा के लिए खोल दी।
सीख – बिना दिशा और बिना सोच के की गई मेहनत कोल्हू के बैल जैसी होती है। अगर हम सीखेंगे, समझेंगे और लक्ष्य बनाएँगे तभी जीवन में आगे बढ़ पाएँगे।
डॉ संजीदा खानम शाहीन




