राममय होती चेतना का अवतरण: गोस्वामी तुलसीदास और हमारा अंतर्जगत’ –डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद ,गुजरात।

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि,यह पावन बेला, जब प्रकृति झूम रही होती है, वसुधा तृप्त होती है, और आसमान से अमृत जैसी फुहारें गिर रहीं होतीं हैं,भारतीय संस्कृति के प्राण, वही महाकवि गोस्वामी तुलसीदास के प्राकट्य का दिन है। यह केवल एक तिथि का स्मरण नहीं है, बल्कि उस महामानव की चेतना से जुड़ने का अवसर है, जिन्होंने अपनी लेखनी से भारतवर्ष के कण-कण में राम को बसा दिया।
तुलसी का जीवन शून्यता से शिखर तक़ की यात्रा है।प्रारंभ ही आंसुओं और उपेक्षा से हुआ था। समाज द्वारा त्यागे गए, दुःखों की भट्ठी में तपे उस बालक ने जब शब्द संभाले, तो उसने कटुता या विद्रोह का मार्ग नहीं चुना, बल्कि प्रेम, करुणा और शरणागति का अमृत उड़ेल दिया।
“भ्रष्टोऽहं, कृपणोऽहं, गतिरस्त्यन्यथा नैव…” ये केवल पंक्तियाँ नहीं, बल्कि अकिंचनता का बोध कराता हुआ, अहंकार के विसर्जन का वह सूक्ष्म बिंदु है जहाँ व्यक्ति अपनी लघुता को स्वीकार कर विराट् से जुड़ जाता है।
तुलसीदास जी का जीवन पीड़ा का परावर्तन है।हमें यह सिखाता है कि व्यक्तिगत संताप को किस प्रकार सार्वभौमिक लोक-कल्याण में बदला जा सकता है। उनके आँसू केवल उनके अपने नहीं थे, बल्कि वे पूरी मानवता के संताप को अपनी मसी (स्याही) में घोलकर कागज़ पर उतार रहे थे।
रामचरितमानस केवल ग्रंथ नहीं, जीवन-दर्शन है।
जब हम ‘श्रीरामचरितमानस’ को खोलते हैं, तो हम किसी पुस्तक के पन्ने नहीं पलट रहें होतें, बल्कि अपने ही भीतर के उतार-चढ़ाव, संघर्ष और समाधान से रूबरू हो रहे होते हैं।
“सचिव बैद गुरु तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होइ बेगि नहीं नास।।”
यह केवल कूटनीति या चिकित्सा का सूत्र नहीं है, बल्कि यह हमारे अंतस की उस सत्यनिष्ठा का आईना है, जहाँ हम सुनना तो प्रिय चाहते हैं, किंतु हितकारी सत्य से दूर भागते हैं। तुलसी ने राम के रूप में कोई अजेय योद्धा मात्र नहीं गढ़ा, बल्कि एक ऐसा आदर्श मानव प्रस्तुत किया जो मर्यादा, त्याग, वात्सल्य और समरसता की पराकाष्ठा है।तुलसी-चिंतन की प्रासंगिकता आज भी महत्त्पूर्ण है। आज का मनुष्य भौतिकता की अंधी दौड़ में दिशाहीन, अकेला और आंतरिक रूप से दरिद्र होता जा रहा है। चारों ओर शोर है, पर संवाद नहीं है। उपलब्धियाँ हैं, पर संतोष नहीं है। ऐसे समय में तुलसीदास जी का सूक्ष्मदर्शी चिंतन हमें भीतर झाँकने की चेतावनी देता है। तुलसी ने हमें सिखाया कि जब तक़ भीतर का ‘मैं’ (अहंकार) नहीं मिटेगा, तब तक़ भीतर के राम (चेतना) का अभिषेक नहीं हो सकता। संबंधों की पवित्रता में भाई का भाई के प्रति प्रेम (भरत-मिलाप), पति-पत्नी का समर्पण, और सेवक का स्वामी के प्रति भाव, तुलसी ने हर रिश्ते को एक आध्यात्मिक ऊंचाई दी और समरसता का संदेश दिया ।निषादराज, शबरी, और केवट को गले लगाकर उन्होंने सदियों पहले उस समाज की नींव रखी थी जहाँ प्रेम और भक्ति ही श्रेष्ठता का एकमात्र पैमाना है। हमारे लिए एक संवेदनशील आह्वान यह है कि गोस्वामी तुलसीदास जयंती पर हमारा यह चिंतन तभी सार्थक है जब हम अपने भीतर के राम को पहचान सकें। राम कोई बाह्य सत्ता नहीं हैं, बल्कि हमारे भीतर की वह परम चेतना है जो करुणा, सत्य और न्याय की प्रेरणा देती है। इस पावन अवसर पर संकल्प लें कि हम अपने जीवन के विकारों और कुसंस्कारों की कालिख को तुलसी के आदर्शों रूपी गंगाजल से धोएंगे, ताकि हमारा अंतर्जगत भी राममय हो सके।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद ,गुजरात।




