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साहित्य संगम मंच की मासिक काव्य गोष्ठी में गूँजे भक्ति, प्रेम और आत्ममंथन के स्वर

नवरात्रि, विजयदशमी, शीत ऋतु के आगमन और मीरा सजवान के जन्मदिन को किया समर्पित आयोजन

 

साहित्य संगम मंच की अक्टूबर माह की मासिक काव्य गोष्ठी
नवरात्रि, विजयदशमी, शीत आगमन और मीरा सजवान के जन्मदिन को समर्पित काव्य समारोह साहित्य, संस्कृति और काव्य की मधुरिम छटा से सजी साहित्य संगम मंच की अक्टूबर माह की मासिक काव्य गोष्ठी नवरात्रि, विजयदशमी, शीत ऋतु के आगमन तथा मंच की कर्मठ कार्यकर्ता एवं मॉडरेटर मीरा सजवान जी के जन्मदिन को समर्पित रही। गोष्ठी का सफल संचालन मंच की संस्थापिका शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ ने किया तथा संयोजन का दायित्व मंच की उपाध्यक्ष अलका गर्ग ‘अक्ष’ ने निभाया।

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कार्यक्रम का शुभारंभ अलका गर्ग ‘अक्श’ जी द्वारा मधुर कंठ से प्रस्तुत माँ सरस्वती की वंदना से हुआ। उनकी सुरमयी प्रस्तुति ने वातावरण को भक्तिमय और साहित्यिक ऊर्जा से भर दिया।
विजयदशमी के रंग में रंगी काव्य प्रस्तुतियाँ
गोष्ठी में विजयदशमी के पावन पर्व को केंद्र में रखकर प्रस्तुत रचनाओं में सत्य की विजय, अधर्म का अंत, प्रेम, सद्भाव और आत्ममंथन के विविध स्वर मुखर हुए।
प्रभात झा जी ने मन से बैर और कपट मिटाकर प्रेम का दीप जलाने तथा राम के सच्चे भक्त बनकर जीवन को सार्थक बनाने का संदेश देती अपनी रचना प्रस्तुत की
मन से बैर, कपट मिटाकर, प्रेम का दीप जलाना है।
राम के सच्चे भक्त बनकर, जीवन पार लगाना है॥
उनकी प्रस्तुति ने पर्व के आध्यात्मिक और मानवीय पक्ष को सुंदर अभिव्यक्ति दी।
गणपत सिंह भदौरिया जी ने अपनी ओजपूर्ण रचना के माध्यम से रावण के अहंकार के पतन और विजय के शंखनाद का प्रभावशाली चित्र प्रस्तुत किया
गूँज उठा है दसों दिशा में,
आज विजय का शंख महान।
घमंड ढहा लंकेश असुर का,
रघुपति ने साधा संधान।
उनकी सशक्त प्रस्तुति ने श्रोताओं में उत्साह और वीर रस का संचार किया।
सुनीता तिवारी जी ने अपनी रचना के माध्यम से समाज में व्याप्त बुराइयों पर गहरा कटाक्ष किया
जला दिए कागज के पुतले, फिर भी रावण नहीं जले।
एक जलाओ, दूजे जन्मे, यही क्रम अनवरत चले।
उनकी पंक्तियों ने इस विचार को उभारा कि केवल पुतलों का दहन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज और व्यक्ति के भीतर विद्यमान बुराइयों पर भी विजय आवश्यक है।
नीलम पटेल जी ने भक्तिमय भावों से ओतप्रोत रचना में माता शबरी की अनन्य भक्ति और प्रभु श्रीराम के प्रति उनके प्रेम का मनोहारी चित्रण किया—
रो-रोकर शबरी ने प्रभु राम के पाँव पखारे।
अहो! भाग्य प्रभु राम हमारे कुटिया में पधारे।
उनकी भावपूर्ण प्रस्तुति ने भक्ति और समर्पण की भावना से वातावरण को सराबोर कर दिया।
रुकमणी शर्मा जी ने प्रेम और सद्भाव का संदेश देती अपनी मधुर रचना से सभी का मन मोह लिया
हर मन का बैर हमें मिटाना है,
हर मन में प्रेम दीप हमें जलाना है।
उनकी प्रस्तुति ने विजयदशमी के पर्व को मानवीय संवेदनाओं से जोड़ते हुए प्रेमपूर्ण समाज की कल्पना को स्वर दिया।
मधु मंगल सिंह ‘मधु’ जी ने अपनी हृदयस्पर्शी रचना में रामायण के पात्रों के माध्यम से वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर सार्थक व्यंग्य प्रस्तुत किया
दशरथ को बनवास मिला है,
राम गए इतिहास में।
मंथरा रानी बन बैठी हैं,
रहती अब रनिवास में।
उनकी रचना ने समकालीन विसंगतियों की ओर संकेत करते हुए श्रोताओं को चिंतन के लिए प्रेरित किया।
अंशू जैन जी ने अपने मधुर कंठ से मनमोहक रचना प्रस्तुत करते हुए विजयदशमी को सत्य की विजय और बुराई पर अच्छाई के प्रहार का प्रतीक बताया
दशहरा आया, सत्य की जय का त्योहार है,
बुराई पर अच्छाई का ये ही तो प्रहार है!
उनकी सुरीली प्रस्तुति ने पर्व के उल्लास को और बढ़ा दिया।
अलका गर्ग ‘अक्ष’ जी ने रावण दहन को एक संवेदनशील दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हुए अपनी रचना की मार्मिक पंक्तियाँ पढ़ीं
आज ज्यों ही हो मैं चली देख के रावण दहन,
एक दर्द भरी चीख ने रोक लिए मेरे कदम।
उनकी प्रस्तुति ने रावण दहन के दृश्य के पीछे छिपे मानवीय प्रश्नों और संवेदनाओं को स्वर प्रदान किया।
सीमा पुरबा ‘सिम्मी’ जी ने अपनी प्रभावशाली रचना से समाँ बाँध दिया
रावण के पुतले का दहन तो हर बार होता है,
अधर्म पर धर्म की विजय का सत्कार होता है।
उनकी पंक्तियों ने विजयदशमी की परंपरा और उसके सांस्कृतिक महत्त्व को सुंदर अभिव्यक्ति दी।
संस्थापिका की रचनाओं में आत्ममंथन और ऋतु परिवर्तन
मंच की संस्थापिका शिखा खुराना ‘कुमुदिनी’ जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से विजयदशमी के संदेश को आत्ममंथन से जोड़ा। उन्होंने रावण की बुराइयों को दूसरों में खोजने से पहले अपने भीतर पहचानने और उन्हें दूर करने की भावना को स्वर दिया। उनकी प्रस्तुति ने इस विचार को प्रमुखता दी कि वास्तविक विजय स्वयं के दोषों पर विजय प्राप्त करने में निहित है।
इसके साथ ही उन्होंने शीत ऋतु के आगमन पर एक सुंदर कविता प्रस्तुत की, जिसकी आरंभिक पंक्तियाँ थीं
मन में उमंगों का बजने लगा साज़ है,
खुशनुमा मौसम का होने लगा आगाज़ है।
इन पंक्तियों में बदलते मौसम की ताजगी, प्रकृति की मनोहारी छटा और मन में जागती नई उमंगों का सुंदर चित्र उभरा। उनकी दोनों प्रस्तुतियों ने गोष्ठी को वैचारिक गहराई और मौसमी उल्लास से समृद्ध किया।
मीरा सजवान के जन्मदिन पर शुभकामनाओं की बौछार
गोष्ठी का एक विशेष आकर्षण मंच की मॉडरेटर मीरा सजवान जी का जन्मदिन रहा। सभी साहित्यकारों ने उन्हें जन्मदिन की हार्दिक शुभकामनाएँ देते हुए उनके स्वस्थ, सुखी, प्रसन्न और रचनात्मक जीवन की मंगलकामना की।
मीरा सजवान जी ने सभी के स्नेह, शुभकामनाओं और आत्मीय बधाइयों के लिए हृदय से आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपनी सशक्त रचना के माध्यम से रावण के चरित्र को एक अलग दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हुए आत्मनिरीक्षण का संदेश दिया
मैं रावण हूँ, किन्तु आज एक शर्त रखता हूँ,
मुझे वही जलाएगा, जो राम बनकर दिखलाएगा।
इन पंक्तियों ने गोष्ठी में उपस्थित साहित्यकारों को भीतर झाँकने और अपने आचरण का मूल्यांकन करने की प्रेरणा दी। मीरा जी की यह प्रस्तुति समारोह के प्रमुख आकर्षणों में से एक रही।
आत्ममंथन, साहित्य और सद्भाव के साथ संपन्न हुआ समारोह
इस प्रकार साहित्य संगम मंच की अक्टूबर माह की मासिक काव्य गोष्ठी नवरात्रि की भक्ति, विजयदशमी के सांस्कृतिक संदेश, शीत ऋतु के स्वागत और जन्मदिन की आत्मीय खुशियों का सुंदर संगम बनी।
कार्यक्रम में प्रस्तुत रचनाओं ने स्पष्ट किया कि विजयदशमी केवल रावण के पुतले के दहन का पर्व नहीं, बल्कि अहंकार, कपट, बैर और अन्याय जैसी प्रवृत्तियों पर विचार करने का अवसर भी है। कहीं ओज और वीर रस की गूँज सुनाई दी, तो कहीं भक्ति, करुणा, व्यंग्य और प्रेम के स्वर मुखर हुए। ऋतु परिवर्तन की कविता ने आयोजन में नई उमंगों का संचार किया, वहीं मीरा सजवान जी के जन्मदिन ने पूरे वातावरण को आत्मीयता और स्नेह से भर दिया।
साहित्य संगम मंच की यह गोष्ठी साहित्य के माध्यम से सांस्कृतिक परंपराओं को जीवंत रखने, रचनात्मक अभिव्यक्ति को प्रोत्साहित करने और आपसी सद्भाव को सुदृढ़ बनाने की दिशा में एक सुंदर आयोजन रही।
सभी रचनाकारों की सहभागिता, प्रस्तुतियों और आत्मीय शुभकामनाओं ने इस मासिक गोष्ठी को यादगार बना दिया।

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