निजी स्वार्थ के कारण घटते संस्कार – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और संस्कार उसके जीवन की अमूल्य धरोहर हैं। संस्कार ही उसे सही और गलत का भेद सिखाते हैं तथा समाज में सम्मानपूर्वक जीवन जीने की प्रेरणा देते हैं। किंतु वर्तमान समय में निजी स्वार्थ की भावना इतनी प्रबल होती जा रही है कि संस्कारों का महत्व धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है।
आज अधिकांश लोग अपने लाभ और सुविधाओं को सर्वोपरि मानने लगे हैं। रिश्तों की मिठास, अपनापन और संवेदनाएँ स्वार्थ की भेंट चढ़ती जा रही हैं। जहाँ पहले परिवार में त्याग, सहयोग और सम्मान का वातावरण होता था, वहीं अब कई स्थानों पर स्वार्थ के कारण मतभेद और दूरियाँ बढ़ रही हैं। व्यक्ति अपने हित के लिए दूसरों की भावनाओं की अनदेखी करने लगा है।
निजी स्वार्थ का प्रभाव समाज के हर क्षेत्र में दिखाई देता है। राजनीति, व्यापार, शिक्षा और सामाजिक जीवन में नैतिक मूल्यों की अपेक्षा व्यक्तिगत लाभ को अधिक महत्व दिया जाने लगा है। लोग सफलता पाने के लिए ईमानदारी और नैतिकता से समझौता करने में भी संकोच नहीं करते। इससे समाज में विश्वास और पारस्परिक सम्मान की भावना कमजोर होती जा रही है।
संस्कारों के क्षरण का एक कारण आधुनिक जीवन की भागदौड़ भी है। माता-पिता के पास बच्चों के लिए पर्याप्त समय नहीं है, जिसके कारण बच्चों को नैतिक शिक्षा और जीवन-मूल्यों का उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पाता। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी भौतिक उपलब्धियों को ही जीवन का लक्ष्य मानने लगती है और संस्कार पीछे छूट जाते हैं।
वास्तव में, स्वार्थ जीवन का एक स्वाभाविक पक्ष है, किंतु जब यह मर्यादा की सीमा लाँघ जाता है, तब संस्कारों को निगलने लगता है। हमें यह समझना होगा कि केवल अपना हित सोचने से समाज का विकास संभव नहीं है। सहयोग, सहानुभूति, सेवा और सम्मान जैसे गुण ही समाज को मजबूत बनाते हैं।
अतः आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने बच्चों को अच्छे संस्कार दें, स्वयं आदर्श प्रस्तुत करें और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर सामूहिक हित के बारे में सोचें। संस्कारों की रक्षा ही समाज की वास्तविक प्रगति का आधार है। जब स्वार्थ पर संस्कारों की विजय होगी, तभी एक स्वस्थ, सशक्त और मानवीय समाज का निर्माण संभव होगा।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




