संवाद – बिन मौसम की बरसात – मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’

ये देखो… बिन मौसम की बरसात। जैसे आसमान भी आज कुछ कहना चाहता है। दूर से एक आवाज़ सरसराती हुई एकदम करीब आकर बोली…
“ध्यान से सुनना, कहीं हमारे मन की कहने आया हो।”
हल्की-सी मुस्कान के साथ देखती रही उन काले घिरे बादलों को… दिल में दबे हुए कुछ शब्द अचानक भीगकर बाहर आ गए
किसी की यादों के साथ…
लगा वो खड़ा हैं पास ही और कह रहा कि —
आदत पुरानी है तुम्हारी…हर मौके पर अपनी मौजूदगी जताने कि….
अरे,
( “मैं तो हर पल तुम्हारी सांसों में घुला हूंँ”)
(सोचते हुए )
-उसकी बातें याद आने लगी
तभी तुम हर हाल में चले आते हो…इस बरसात की मानिंद…”क्या ये भी संयोग है या इस बरसात की तरह बेवजह? बेवजह कुछ नहीं होता… कुछ बरसातें वजह लेकर नहीं आती, बस एहसास जगाने आती हैं।
तो क्या ये बरसात भी… हमें कुछ याद दिलाने आई है?
शायद… वो पहली मुलाकात, जब बारिश नहीं थी, फिर भी हम भीग गए थे।
भीगे तो आज भी हैं… फर्क बस इतना है कि तब बारिश बाहर थी, अब अंदर है इंतजार की बारिश… कब थमेगी पता नहीं?
जब तुम यूँ ही मेरी यादों में पास बैठी रहोगी… शायद तब ये बूंंदें मुस्कान बन जाएँ। तो चलो…इस बिन मौसम की बरसात को यूँ ही जी लेते हैं, बिना किसी सवाल के।
हाँ… क्योंकि कुछ लम्हें जवाब नहीं, सिर्फ एहसास मांगते हैं। भीतर की ख़ामोशी के बीच बारिश की बूंदें अनकहे शब्द बनकर गिरती रही और मौन ने उन यादों को आत्मसात कर लिया।
बस वो यूँ ही चला आता यादों में
मंजू शर्मा ‘मनस्विनी’




