बहस के अहंकार से विमर्श के आलोक तक़ – -डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

जीवन के पथ पर हम अक़्सर शब्दों के युद्ध में उलझ जाते हैं। बहस और विचार-विमर्श में सूक्ष्म किंतु गहरा अंतर है। बहस में हम ‘कौन सही है’ यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं, जबकि विचार-विमर्श में ‘क्या सही है’ यह खो़जने का। बहस का जन्म ‘मैं’ और अहंकार से होता है, जहाँ उद्देश्य सामने वाले को पराजित करना होता है। इसमें हम सुनने के लिए नहीं, बल्कि खंड़न के लिए तत्पर रहते हैं, जिससे विवेक का ह्रास होता है। इसके विपरीत विचार-विमर्श ‘हम’ से उपजता है। यह सत्य के प्रति निष्ठा और अपनी सीमाओं को स्वीकारने की प्रक्रिया है। यहाँ दो विचार मिलकर नई रोशनी पैदा करते हैं। इस बदलाव के लिए देह-अहंकार का विसर्जन आवश्यक है। जब हम ‘मैं सही हूँ’ के स्थान पर ‘क्या सही है’ को प्राथमिकता देते हैं, तो शोर थम जाता है और समझ समृद्ध होती है। आइए, अहंकार त्यागकर एक जिज्ञासु श्रोता बनें, क्योंकि सत्य को स्वयं से बड़ा मानना ही मानवता का मार्ग है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




