यादों का सफ़र- प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

पुराने घर की सफ़ाई करते हुए नीलम की नज़र लकड़ी के एक छोटे-से संदूक पर पड़ी। वर्षों से बंद पड़े उस संदूक पर धूल की मोटी परत जमी थी। उसने धीरे से ताला खोला। भीतर कुछ पीले पड़ चुके पत्र, एक पुरानी घड़ी, काले-सफेद तस्वीरें और सूखे गुलाब के फूल रखे थे। जैसे ही उसने पहली तस्वीर हाथ में ली, बीते दिनों की परतें खुलने लगीं।
तस्वीर में पूरा परिवार मुस्कुरा रहा था। पिता के कंधे पर बैठा उसका छोटा भाई, माँ की गोद में वह स्वयं और पीछे खड़े दादा-दादी। वह दृश्य मानो आज भी जीवित था। नीलम की आँखें नम हो गईं। उसे याद आया कि उसी आँगन में कितनी बार बारिश में भीगते हुए कागज़ की नावें चलाई थीं, दादी की कहानियाँ सुनी थीं और माँ की डाँट के बाद पिता की मुस्कान में सारा गुस्सा भूल गई थी।
तभी उसे एक पत्र मिला। वह उसके पिता की लिखावट थी—”बेटी, जीवन में आगे बढ़ना, लेकिन अपनी जड़ों को कभी मत भूलना। यादें मनुष्य की सबसे बड़ी पूँजी होती हैं।”
पत्र पढ़ते-पढ़ते नीलम की पलकों से आँसू टपक पड़े। वर्षों पहले नौकरी और सुविधाओं की तलाश में वह महानगर चली गई थी। धीरे-धीरे व्यस्तता इतनी बढ़ी कि गाँव, रिश्ते और अपने लोग पीछे छूटते गए। आज जब घर लगभग सूना था, तब उसे एहसास हुआ कि समय कभी लौटकर नहीं आता।
उसी क्षण बाहर बच्चों की खिलखिलाहट सुनाई दी। पड़ोस के कुछ बच्चे आँगन में खेल रहे थे। नीलम मुस्कुराई। उसने संदूक से पुरानी तस्वीरें और कुछ खिलौने निकाले और बच्चों को बुला लिया। बच्चों की हँसी से वर्षों से खामोश पड़ा आँगन फिर से जीवंत हो उठा।
शाम ढलने लगी। नीलम ने संदूक को फिर से बंद किया, पर इस बार उसने उसे अँधेरे कमरे में नहीं रखा। उसने उसे बैठक में सजा दिया, ताकि हर आने-जाने वाला जान सके कि जीवन की सबसे अनमोल दौलत धन नहीं, बल्कि वे यादें हैं जो हमें अपनी मिट्टी, अपने रिश्तों और अपने अस्तित्व से जोड़े रखती हैं।
उस दिन नीलम समझ गई कि यादों का सफ़र कभी समाप्त नहीं होता। यह पीढ़ियों के बीच प्रेम, संस्कार और अपनत्व की वह डोर है, जो समय के हर मोड़ पर हमें फिर से अपने घर का रास्ता दिखा देती है।
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




