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खामोश रिश्ते, – (ताईजी..ताईजी.) अलका गर्ग” अक्श “ गुरुग्राम

 

प्रभात ने आँगन में घुसते हुए आवाज़ लगाई पर प्रत्युत्तर में कोई आवाज़ नहीं मिलने पर घबरा गया।
कहीं ताईजी की तबीयत ज़्यादा तो नहीं बिगड़ गई…
कहीं बेहोश तो नहीं हो गईं…

जल्दी से ताईजी के कमरे में पहुँचा तो देखा कि वे सोई हुई हैं।
धीमी गति से साँस चल रही है।देख कर निश्चिंत हो गया और पास ही कुर्सी पर बैठ कर अपनी घबराहट पर काबू पाने की कोशिश करने लगा।

उस के पड़ोस में निःसंतान ताईजी और ताऊजी अकेले रहते थे।दोनों परिवारों में अच्छे संबंध थे।कुछ समय से ताऊजी की तबीयत ख़राब थी लेकिन इतनी भी नहीं कि बुलवा ही आ जाए।पर नियति के विधान को कौन जानता है।
अब ताईजी बिल्कुल अकेली रह गई थीं।
सभी पड़ोसियों को उनकी चिंता थी पर प्रभात को सबसे ज़्यादा..
अपनी जड़ें छोड़ कर रिश्तेदारों के पास जाना ताईजी को मंज़ूर नहीं था। माघ पूस की कड़कती ठंड में ताईजी के पैरों की उँगलियाँ सूज कर मटर जैसी गोल हो जातीं फिर भी वे पानी के काम करती रहतीं। ऐसी अवस्था में भी कुत्ते गाय ब्राह्मण की रोटी, चींटी को आटा, छत पर चिड़ियों को दाना पानी..ताईजी अपने दुखते घुटनों पर हाथ रख रख कर चलते हुए सारे धर्म निभातीं।
धीरे धीरे न जाने कब प्रभात ने ये चलने फिरने वाले सारे काम अपने ऊपर ले लिए। बाज़ार जाते आते सामान और दवाई लाना, छत के पौधों में पानी डालना और जानवरों का दाना पानी सब कुछ…जिससे कि ताईजी को कम से कम चलना पड़े।
मंदिर की तरह हर शाम ताईजी के घर जरूर जाता दिन भर का समाचार और अपने लायक कुछ काम बचा हो तो करने के लिए।
एक युवा और एक बुजुर्ग का यह बेनाम और खामोश रिश्ता पास पड़ोस के लिए प्रशंसा का विषय था।
प्रभात का विवाह नहीं हुआ था।उसकी बुजुर्ग माँ भी ताईजी की ज़्यादा मदद नहीं कर सकती थीं।इसलिए उसने चुपचाप ताईजी का सारा जिम्मा अपने ऊपर ले लिया।
इस बार शायद कुछ ज़्यादा ही ठंड पड़ी है जो ताईजी के लिए झेलनी मुश्किल होगी।
काम से लौट कर शाम को उनके लिए कोयले की अँगीठी जला कर कमरे में रख देता। पास मे शॉल थर्मस में गर्म पानी रखता।उसने मौजों में नीचे प्लास्टिक की पन्नी काट कर गोंद से चिपका कर रख दीं थीं जिससे ताईजी को जमीन ठंडी ना लगे। वे घर में चप्पल नहीं पहनती थीं।
एक सुबह फिर..ताईजी…ताईजी…और ख़ाली शब्द फिर से उस दिन की तरह उसके पास लौट कर आ गए।
देखा ताईजी उसके पन्नी चिपकाये हुए मौजे पहन कर चैन की नींद सो रही हैं।शायद उस खामोश रिश्ते की नर्म गर्माहट ने उन्हें आज सुकून से सुला दिया था…

अलका गर्ग” अक्श “
गुरुग्राम

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