वो एक लम्हा – शिखा खुराना
जीवन में कुछ पल ऐसे आते हैं जो समय की घड़ी में भले ही कुछ मिनटों के हों, पर उन्हें जीते हुए लगता है मानो पूरी एक उम्र बीत गई हो। ऐसा ही एक लम्हा आज भी याद करती हूँ तो रूह काँप उठती है।
यह उन दिनों की बात है जब मेरे बच्चे किशोरावस्था में थे। पति की पोस्टिंग दूसरे शहर में थी, इसलिए घर और बाहर की सारी जिम्मेदारियाँ अकेले मेरे कंधों पर थीं। सुबह बच्चों को स्कूल भेजना, स्वयं कार्यालय जाना, घर की व्यवस्था देखना और दिन भर फोन पर बच्चों की पढ़ाई, भोजन और दिनचर्या की चिंता करना मेरी रोज़मर्रा की जिंदगी का हिस्सा था।
उस दिन भी सब कुछ सामान्य ही था। दोपहर में बच्चे स्कूल से घर लौट आए थे। रोज़ की तरह मैंने कार्यालय से फोन किया। बेटा कुछ बुझा-बुझा और परेशान लग रहा था। मैंने कारण पूछा तो धीमे स्वर में बोला, “मम्मी, आज क्लास टेस्ट के नंबर आए हैं। मेरे बहुत कम नंबर आए हैं। मेरा मन बहुत खराब है।”
उसकी उदासी मेरे दिल तक उतर गई। मैंने उसे प्यार से समझाया, “बेटा, एक टेस्ट से जिंदगी तय नहीं होती। मेहनत करो, अगली बार और अच्छे अंक आ जाएंगे। असफलता ही सफलता की पहली सीढ़ी होती है।” मेरी बात सुनकर उसने “जी मम्मी” कहा और फोन रख दिया। मुझे लगा, शायद अब उसका मन हल्का हो गया होगा।
कार्यालय के काम में मैं फिर व्यस्त हो गई।
शाम को रोज़ की तरह जब मैंने घर फोन किया तो घंटी बजती रही, पर किसी ने फोन नहीं उठाया। पहले तो लगा शायद बाथरूम में होगा या किसी काम में व्यस्त होगा। पाँच-दस मिनट बाद फिर फोन किया, फिर भी कोई उत्तर नहीं।
अब मन में एक अनजानी आशंका जन्म लेने लगी। मैंने लगातार कई बार फोन मिलाया, लेकिन हर बार वही सन्नाटा।
घबराकर मैंने पड़ोसियों को फोन किया और उनसे घर जाकर देखने का अनुरोध किया। वे तुरंत पहुँचे। उन्होंने कई बार डोरबेल बजाई, दरवाज़ा खटखटाया, आवाज़ें लगाईं, लेकिन भीतर से कोई प्रतिक्रिया न




