शीर्षक: माँ का आँचल -कहानी – सुमन दूबे साऊंखोर बड़हलगंज गोरखपुर

गाँव के एक छोटे से घर में राधा अपने दस वर्षीय बेटे मोहन के साथ रहती थी। मोहन के पिता का कई वर्ष पहले देहांत हो चुका था। घर की सारी जिम्मेदारी राधा के कंधों पर थी। वह दिन-रात मेहनत करके अपने बेटे की पढ़ाई और पालन-पोषण करती थी। गरीबी थी, लेकिन माँ के स्नेह और संस्कारों की कोई कमी नहीं थी।
हर सुबह राधा अपने आँचल से मोहन का चेहरा पोंछती, उसके बाल संवारती और अपने हाथों से खाना खिलाकर उसे स्कूल भेजती। मोहन जब भी डरता या उदास होता, माँ के आँचल में सिर छिपाकर अपने सारे दुख भूल जाता। उसे लगता था कि दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह उसकी माँ का आँचल है।
एक दिन स्कूल में वार्षिक परीक्षा का परिणाम घोषित होना था। मोहन बहुत घबराया हुआ था। उसने घर आकर कहा, “माँ, अगर मैं अच्छे अंक नहीं ला पाया तो?” राधा ने मुस्कुराकर उसे अपने आँचल से ढक लिया और बोली, “बेटा, मेहनत करने वाला कभी हारता नहीं। परिणाम चाहे जैसा हो, मेरा प्यार हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा।”
अगले दिन परिणाम आया। मोहन पूरे विद्यालय में प्रथम आया। वह खुशी से दौड़ता हुआ घर पहुँचा और माँ के गले लग गया। राधा की आँखों से खुशी के आँसू बहने लगे। उसने अपने आँचल से मोहन का माथा पोंछा और कहा, “आज मेरी मेहनत सफल हो गई।”
समय बीतता गया। मोहन पढ़-लिखकर एक बड़ा अधिकारी बन गया। उसे शहर में नौकरी मिल गई। उसने माँ को भी अपने साथ शहर ले जाने की बहुत कोशिश की, लेकिन राधा ने कहा, “मेरा मन इसी गाँव में बसता है।”
कुछ वर्षों बाद राधा बीमार पड़ गई। यह समाचार सुनकर मोहन तुरंत गाँव पहुँचा। उसने देखा कि उसकी माँ बहुत कमजोर हो चुकी है। वह माँ के पास बैठ गया और उसका हाथ पकड़ लिया। राधा ने काँपते हुए अपने आँचल से बेटे का चेहरा सहलाया और बोली, “बेटा, चाहे तुम कितने भी बड़े बन जाओ, मेरे लिए हमेशा वही छोटे से मोहन रहोगे।”
मोहन की आँखों से आँसू बह निकले। उसे बचपन की हर बात याद आने लगी—माँ का प्यार, उसकी डाँट, उसके हाथ का खाना और सबसे बढ़कर माँ का आँचल, जिसने हर दुख और डर से उसकी रक्षा की थी। उसने माँ के चरणों में सिर रखकर कहा, “माँ, आज जो कुछ भी हूँ, आपके त्याग और आपके आँचल की छाया की वजह से हूँ।”
राधा मुस्कुराई। उसके चेहरे पर संतोष था कि उसका बेटा जीवन में सफल होने के साथ-साथ अपने संस्कार भी नहीं भूला।
सुमन दूबे साऊंखोर
बड़हलगंज गोरखपुर




