“वो लोकल ट्रेन का सफ़र” – प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”

आज भी जब कहीं रेल की सीटी सुनाई देती है, तो मेरी स्मृतियाँ बरसों पीछे लौट जाती हैं। लोकल ट्रेन की वे यात्राएँ आज भी मेरे मन के किसी कोने में वैसे ही बसी हैं, जैसे कल की ही बात हो।
उन दिनों सुबह-सुबह घर से निकलकर स्टेशन पहुँचना मेरी दिनचर्या का हिस्सा था। प्लेटफ़ॉर्म पर लोगों की इतनी भीड़ होती कि कदम रखने तक की जगह नहीं मिलती थी। हर किसी की निगाह आने वाली ट्रेन पर टिकी रहती। जैसे ही ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म पर रुकती, मानो पूरा सैलाब एक साथ उमड़ पड़ता। डिब्बे में चढ़ने के लिए मुझे भी कई बार भीड़ के साथ बहना पड़ता था। कभी किसी का कंधा छू जाता, कभी किसी का बैग, तो कभी स्वयं को संभालना भी कठिन हो जाता।
शुरुआत में यह भीड़ मुझे बहुत डराती थी। लगता था कि मैं इस भागती-दौड़ती दुनिया का हिस्सा कभी नहीं बन पाऊँगी। लेकिन धीरे-धीरे मैंने उसी भीड़ में अपने लिए जगह बनाना सीख लिया। समय ने मुझे धैर्य सिखाया और लोकल ट्रेन ने आत्मविश्वास।
महिला डिब्बे की अपनी ही दुनिया थी। रोज़ दिखाई देने वाले चेहरे धीरे-धीरे परिचित लगने लगे थे। बिना नाम जाने भी मुस्कान का आदान-प्रदान हो जाता था। कोई अपने घर की बातें करती, कोई बच्चों की चिंता साझा करती, तो कोई हँसी-मज़ाक से पूरे डिब्बे का माहौल हल्का कर देती। अनजान होकर भी हम सब जैसे एक-दूसरे का सहारा बन जाती थीं।
खिड़की के पास खड़े होकर बाहर भागते पेड़ों, इमारतों और पुलों को देखना मुझे बहुत अच्छा लगता था। लगता था जैसे शहर अपनी पूरी रफ़्तार से दौड़ रहा है और मैं भी उसके साथ अपने सपनों की ओर बढ़ रही हूँ।
आज जीवन की परिस्थितियाँ बदल गई हैं, लेकिन जब भी उन दिनों को याद करती हूँ, तो भीड़ की धक्का-मुक्की नहीं, बल्कि उस भीड़ में छिपी आत्मीयता याद आती है। वो लोकल ट्रेन का भीड़ भरा सफ़र मेरे लिए केवल एक सफ़र नहीं था, बल्कि जीवन का ऐसा अनुभव था जिसने मुझे संघर्ष, धैर्य, समय का महत्व और अनजान लोगों के बीच भी अपनापन महसूस करना सिखाया।
आज भी उन स्मृतियों को याद करके मेरे चेहरे पर अनायास मुस्कान खिल उठती है। सचमुच, जीवन की कुछ सबसे अनमोल सीखें मुझे उसी लोकल ट्रेन के भीड़भाड़ वाले सफ़र ने दी थीं:::
प्रवीणा सिंह राणा “प्रदन्या”




