प्रेम और परमात्मा -डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

जीवन में प्रेम और परमात्मा का अस्तित्व किसी प्रमाण का मोहताज़ नहीं है; वे सत्य हैं, जो तर्कों से परे अनुभव की वस्तु हैं। अक़्सर हम इन्हें बाहरी ‘चित्रण’,जैसे मूर्तियों या भावनाओं तक़ सीमित कर देते हैं, जबकि वास्तव में ये ‘चरित्र’ हैं।
आत्म-प्रेम इस यात्रा की नींव है, जहाँ हम अपने अस्तित्व को पूर्ण स्वीकृति देते हैं। यह अहंकार नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर परमात्मा के अंश को पहचानने की एक विनम्र प्रक्रिया है। जब आत्म-प्रेम का बीज अंकुरित होता है, तब वह निस्वार्थ प्रेम के वटवृक्ष का रूप ले लेता है। निस्वार्थ प्रेम वह अवस्था है, जहाँ ‘मैं’ और ‘पर’ का भेद मिट जाता है और प्रेम प्रतिफल की अपेक्षा से मुक्त होकर ‘चरित्र’ बन जाता है। अंततः, प्रेम और परमात्मा एक ही सत्य के दो नाम हैं। जब मनुष्य स्वयं के भीतर इस सत्य को जी लेता है, तब उसे ‘चरित्रानंद’ की प्राप्ति होती है।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।




