शिखरजी की 52 किलोमीटर परिक्रमा के लिए जयपुर से रवाना होगा 200 यात्रियों का दल
एक अक्टूबर को प्रस्थान, सातवीं बार होगी पर्वतराज की परिक्रमा

जयपुर। जैन धर्म के 20 तीर्थंकरों की निर्वाण भूमि और शाश्वत सिद्ध क्षेत्र तीर्थराज श्री सम्मेद शिखरजी की 52 किलोमीटर की परिक्रमा के लिए जयपुर से 200 यात्रियों का दल एक अक्टूबर को रवाना होगा। सिद्धार्थ नगर जयपुर जैन समाज की ओर से आयोजित यह सातवीं तीर्थयात्रा गौरव मुनि विशाल सागर महाराज की प्रेरणा से होगी। यात्रा में तीर्थ वंदना, श्री सम्मेद शिखर विधान, पर्वत की 27 किलोमीटर पदवंदना और 52 किलोमीटर की पैदल परिक्रमा सहित कई धार्मिक आयोजन होंगे।
यात्रा के मुख्य संयोजक महावीर रांवका ने बताया कि श्री विद्यासागर यात्रा संघ जयपुर के पूर्ण सहयोग से लगातार सातवीं बार पर्वतराज की परिक्रमा का आयोजन किया जा रहा है। 3 अक्टूबर को यात्रियों द्वारा श्री सम्मेद शिखर पर्वत की 27 किलोमीटर की पदवंदना की जाएगी। 4 अक्टूबर को तलहटी स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में संगीतमय श्री सम्मेद शिखर पूजा विधान तथा आचार्य विद्यासागर महाराज की महापूजा होगी। 5 अक्टूबर को सुबह पर्वत की पैदल परिक्रमा शुरू होगी। रात्रि विश्राम निमियाघाट स्थित दिगम्बर जैन मंदिर में होगा। 6 अक्टूबर को मंदिर में अभिषेक, शांतिधारा और पूजा-अर्चना के बाद परिक्रमा का मधुबन में शाम को समापन होगा।
श्री सम्मेद शिखरजी के कण-कण में में है सिद्धत्व:
राजस्थान जैन युवा महासभा के प्रदेश महामंत्री विनोद जैन ‘कोटखावदा’ ने बताया कि जैन मान्यता के अनुसार श्री सम्मेद शिखरजी के कण-कण में सिद्धत्व और निर्वाण की आभा है। वर्तमान चौबीसी के 20 तीर्थंकरों में से 20 ने यहां की 20 टोंकों से मोक्ष प्राप्त किया। मान्यता के अनुसार यहां 86 अरब 488 कोड़ाकोड़ी 140 कोड़ी 1027 करोड़ 38 लाख 70 हजार 323 मुनियों ने भी कर्मों का नाश कर मोक्ष पद प्राप्त किया है।
उन्होंने बताया कि तीर्थराज की ऊंचाई 4579 फुट और क्षेत्रफल करीब 25 वर्ग किलोमीटर है। जैन परंपरा में इसकी वंदना से 33 कोटि 234 करोड़ 74 लाख उपवास के बराबर फल मिलने की मान्यता है। जैनाचार्यों के अनुसार बारह योजन प्रमाण वाले इस सिद्ध क्षेत्र में आने, रहने, बैठने या जन्म लेने वाले जीव के 48 भवों में कर्मबंधन से मुक्त होने की बात कही गई है। तीर्थ वंदना के लिए सफेद, लाल, पीले, हरे और काले वस्त्रों के संबंध में भी क्रमश: मोक्ष, पुत्ररत्न, धन-धान्य, बैरभाव एवं चिंतामुक्ति तथा असाध्य रोग से मुक्ति की धार्मिक मान्यताएं बताई गई हैं।
अजितनाथ भगवान को मिला सर्व प्रथम मोक्ष:
वर्तमान चौबीसी के द्वितीय तीर्थंकर अजितनाथ भगवान ने सर्वप्रथम यहां से मोक्ष प्राप्त किया था। इसके बाद सगर चक्रवर्ती सहित अनेक चक्रवर्तियों ने संघ के साथ तीर्थराज की वंदना की। बीसवीं सदी के प्रथम चारित्र चक्रवर्ती आचार्य शान्तिसागरजी महाराज ने 1927 में चतुर्विध संघ सहित तीर्थराज की पदवंदना के लिए विहार किया था। आचार्य विद्यासागर महामुनिराज ने भी संघ सहित 1983 में श्री सम्मेद शिखरजी की वंदना की थी।
दुर्लभ-पुण्यकारी है तीर्थ यात्रा:
जैन समाज में इस तीर्थ की यात्रा को अत्यंत दुर्लभ और पुण्यकारी माना जाता है तथा जन्म-जन्मांतर के पुण्य से ही तीर्थराज की वंदना और परिक्रमा का अवसर मिलने की मान्यता है।
विनोद जैन कोटखावदा
प्रदेश महामंत्री
राजस्थान जैन युवा महासभा




