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ऐसा भी होता है – राजेन्द्र परिहार”सैनिक “

 

बचपन के मासूमियत वाले दौर में कई मजेदार किस्से आते हैं, कुछ विस्मृतियों में लुप्त हो जाते हैं, लेकिन कुछ किस्से हमेशा के लिए यादों में रह जाते हैं। ऐसा ही एक मज़ेदार किस्सा मेरे साथ भी घटित हुआ था,जिसे मैं आप सभी से साझा कर रहा हूं।

मेरी उम्र तब लगभग ७-८ साल रही होगी। मुझसे एक दिन पिताजी ने कहा कि “राजू ये अखबारों की रद्दी ले जा और इसे सेठ रामजीलाल की किराने की दुकान पर बेच आना और जो पैसे मिले उस तू अपने लिए ही रख लेना। मैं बहुत खुशी खुशी उस दुकान पे गया और रद्दी का थैला सेठजी के सामने उंडेल कर बोला ” सेठ जी पिताजी ने यह रद्दी बेचने भेजा है मुझे। सेठ जी ने तराजू पर रद्दी को तौला और गंभीर स्वर में बोला “बेटा इस रद्दी के बारह आने हो रहे हैं दे दूं..??तब मैंने तपाक से कहा “सेठ जी बारह आने तो कम लगा रहे हैं आप! पिछली बार मैं रद्दी बेचने आया था तो पूरी अठन्नी में बेचकर गया था। उस ज़माने में आने दो आने चार आने
चला करते थे। सेठ जी को हंसी आ गई और हंसकर बोले अरे पगले बारह आने अठन्नी से ज़्यादा होते हैं। मुझे लगा कि सेठजी मुझे बालक समझकर बेवकूफ बना रहे हैं। मैंने उनसे साफ़ साफ़ कह दिया कि अगर अठन्नी में सौदा करना है तो ठीक है, वरना मैं ये रद्दी वापस ले जा रहा हूं। सेठजी ने कहा ठीक है भई “मैं तुम्हें पूरी अठन्नी ही दूंगा। मैंने कहा ठीक है, फिर तो कोई बात नहीं है। सेठजी ने गल्ले से अठन्नी निकाल
कर मुझे सौंप दी और मैं खुशी खुशी उछलता कूदता घर आया और घर में सबके सामने अपनी होशियारी दिखाते हुए ये सारा किस्सा कह सुनाया। सब घर वाले हंस हंस कर लोट-पोट हो रहे थे और मैं एकदम से सकपकाया हुआ सोच रहा था कि इसमें हंसने की कौनसी बात है?? तब पिताजी ने समझाया कि अरे बेवकूफ बारह आने आठ आने से ज्यादा होते हैं और तू तो पच्चीस पैसे के घाटे में रद्दी बेचकर आया है। अब मुझे शर्मिंदगी का एहसास हो रहा था। पिताजी ने ढांढस बंधाते हुए कहा कोई बात नहीं है आगे से ध्यान रखना!!

राजेन्द्र परिहार”सैनिक “

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