लेख – यह संसार एक सपना – सुनीता तिवारी”सरस”

यह संसार जितना सत्य दिखाई देता है, उतना ही वह क्षणभंगुर और परिवर्तनशील भी है।
मनुष्य अपने जीवन में जन्म से मृत्यु तक जिस दौड़ में लगा रहता है, वह अक्सर यह भूल जाता है कि सब कुछ अस्थायी है।
सुख, दुख, सफलता और असफलता…
ये सभी अवस्थाएँ आती-जाती रहती हैं, जैसे कोई स्वप्न आँख खुलते ही विलीन हो जाता है।
भारतीय दर्शन में संसार को माया कहा गया है।
इसका अर्थ यह नहीं कि संसार अस्तित्वहीन है बल्कि यह कि जो हम स्थायी समझ लेते हैं वह वास्तव में स्थायी नहीं होता।
आज जो अपना है वह कल पराया हो सकता है आज जो साथ है वह पल भर में दूर हो सकता है।
यही जीवन की सच्चाई है।
मनुष्य अक्सर वस्तुओं, रिश्तों और पद-प्रतिष्ठा को पकड़कर बैठ जाता है।
वह मान लेता है कि यही सब कुछ स्थायी है जबकि वास्तविकता यह है कि समय सब कुछ बदल देता है।
जैसे स्वप्न में हम हँसते भी हैं और रोते भी हैं लेकिन जागने पर दोनों ही केवल अनुभव रह जाते हैं, वैसे ही जीवन के अनुभव भी अंततः स्मृति बन जाते हैं।
यह समझ लेना आवश्यक है कि जीवन को गंभीरता से जिया जाए, लेकिन उससे चिपका न जाए। कर्तव्य निभाना चाहिए, प्रेम करना चाहिए, पर साथ ही यह भी जानना चाहिए कि सब कुछ परिवर्तनशील है। यही ज्ञान मनुष्य को संतुलन और शांति देता है।
अंतः कहा जा सकता है कि यह संसार एक सुंदर स्वप्न की तरह है, जिसे जीना भी है और समझना भी है, पर उसमें खो जाना नहीं है। जब यह बोध हो जाता है, तब मनुष्य वास्तविक शांति की ओर अग्रसर होता है।
सुनीता तिवारी”सरस”




