माँ धरा की पुकार: हर आँगन में महके जीवन – हसमुख बी. पटेल, ‘हर्ष’-’परख’ नारदीपुर – अहमदाबाद

प्रकृति केवल जल, जंगल और जमीन का मेल नहीं है, यह हमारी चेतना है, हमारी संस्कृति है और सबसे बढ़कर हमारी ‘माँ’ है। सदियों से इस पावन धरा ने हमें निस्वार्थ भाव से सब कुछ दिया—साँस लेने को शुद्ध पवन, प्यास बुझाने को नदियाँ, जीने के लिए अन्न और बेजुबानों के लिए रोटी-कपड़ा-मकान। लेकिन आज वही धरती माँ कराह रही है। इंसानी लालच और कंक्रीट के जंगलों ने उसकी हरी चुनरिया को तार-तार कर दिया है। नदियाँ सूख रही हैं, तापमान की भट्टी में मौसम झुलस रहे हैं और हवा इतनी विषैली हो चुकी है कि हमारी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य धुंधला नजर आ रहा है। यह समय केवल चिंता करने का नहीं, बल्कि अपनी भूल सुधारने का है।
एक नम्र और भावुक अपील:
भारत की मिट्टी में तो कण-कण में भगवान और हर वृक्ष में जीवन देखने की परंपरा रही है। इसी परंपरा को साक्षी मानकर आज हर भारतवासी से एक नम्र और हृदयस्पर्शी अपील है—**इस साल हममें से हर व्यक्ति अनिवार्य रूप से ५ पेड़ लगाए।** यह केवल पौधे रोपना नहीं है, बल्कि इस धरती पर अपनी साँसों का कर्ज चुकाना है।
पहला पेड़ – हमारी अपनी साँसों के लिए हो, जो हमें जीवनदायी ऑक्सीजन दे।
दूसरा पेड़ – राहगीरों और बेजुबान पक्षियों को शीतल छाया और आश्रय देने के लिए हो।
तीसरा पेड़ – प्रकृति के संतुलन के लिए हो, जो मिट्टी को बांधे और सूखे-बाढ़ से रक्षा करे।
चौथा पेड़ – आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य के लिए हो, ताकि उन्हें विरासत में शुद्ध हवा मिल सके।
पांचवा पेड़ – हमारी इस सनातन संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए हो।
लेख का अंत : प्रकृति का प्रारंभ::
जब १३५ करोड़ से अधिक हाथों का संकल्प एक साथ मिट्टी को छुएगा, तो यह देश फिर से हरियाली रंग में सज उठेगा। आइए, अपने बच्चों के जनमदिन, बुजुर्गों की स्मृति या किसी भी शुभ अवसर पर इन पौधों को रोपें और केवल लगाएं ही नहीं, बल्कि एक माँ की तरह उनका लालन-पालन भी करें। जब तक हर हाथ आगे नहीं बढ़ेगा, यह धरती हरी-भरी नहीं होगी। उठिए, इस पुनीत कार्य का हिस्सा बनिए और भारत माँ के आँचल को फिर से खुशहाली से भर दीजिए।
हसमुख बी. पटेल, ‘हर्ष’-’परख’
नारदीपुर – अहमदाबाद




