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संस्मरण: मानव सहानुभूति की सजा – महेश तंवर सोहन पुरा नीमकाथाना (राजस्थान)

 

प्रकृति की सुंदर छटाओं का आनंद लेते हुए जा रहे थे दो दोस्त, राम और राज। हल्की-हल्की सर्दियों के दिन थे। बड़ा सुहाना सफर। वृंदावन की सड़क पर बढ़ती हुई बोलेरो गाड़ी। सुबह के करीब 7:30 बज चुके थे । गाड़ी में मनभावन संगीत चल रहा था, “श्याम तेरे भरोसे मेरी गाड़ी तू जाने तेरा काम जाने” संगीत की धुन में आगे बढ़ रहे थे, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था।
चाय की तलब महसूस करता हुआ राम ने कहा! भाई राज, आगे चाय की दुकान पर चाय पीकर चलेंगे। राज ने कहा, ठीक है भाई राम! तुम्हें तो चाय पिलाएंगे ही। ऐसे बतियाते हुए करीबन डेढ़ किलोमीटर पर एक चाय की दुकान पर गाड़ी रोक कर चाय नाश्ता किया और पुनः वृंदावन की ओर चल दिए। चार-पांच मिनट बाद ही सड़क पर अज्ञात गाड़ी की टक्कर से घायल एक अधेड़ व्यक्ति चिल्ला रहा था। देखते ही गाड़ी रोकी और सहानुभूति दिखाते हुए उसे उठाकर गाड़ी में लिटा कर तुरंत अस्पताल लेकर गए। डॉक्टर साहब ने जानना चाहा कि इस व्यक्ति का नाम क्या है तथा इसका एक्सीडेंट कैसे हुआ? राम और राज ने उपर्युक्त सारी कहानी कहे सुनाई । लेकिन डॉक्टर साहब नहीं माने। घायल व्यक्ति का उपचार करने से पहले से पहले डॉक्टर पुलिस को सूचना दी। पुलिस के आने तक वह घायल व्यक्ति मर चुका था। पुलिस राम और राज को गिरफ्तार कर पुलिस थाना ले गई। राम और राज साफ-साफ बोल रहे थे कि हमारा कोई कसूर नहीं है। हम निर्दोष हैं। हम तो मानवता के नाते इसे उठाकर अस्पताल ले आए। भला इसमें हमारा क्या दोष है ? दो दिन बाद अज्ञात व्यक्ति की शिनाख्त हुई। मृत व्यक्ति के परिजनों ने राम और राज को ही दोषी ठहरा दिया। उनका कहना था कि यदि इन्होंने इसका एक्सीडेंट नहीं किया तो इसको गाड़ी में क्यों बैठाया और अस्पताल क्यों लेकर आए? पुलिस राम और राज को विरासत में लेकर कोर्ट केस कर दिया राम और राज को जेल की सजा सुनाई गई। राम और राज ने अपने और अन्य लोगों को बताया कि कभी भी किसी की सहायता मत करो। यदि कोई मर रहा है तो मरने दो। यदि आप मानवता दिखाने की कोशिश करेंगे तो आपका भी हाल वही होगा जो आज हमारा हो रहा है। न जाने बांके बिहारी ने हमें कौन से कर्म की सज़ा दी है।

महेश तंवर सोहन पुरा
नीमकाथाना (राजस्थान)

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