खामोश रातें (कहानी) – कविता साव पश्चिम बंगाल

रामदीन – लगभग पचपन वर्ष का गरीब किसान।
गोमती – उसकी पत्नी, धैर्य और करुणा की प्रतिमूर्ति।
हरिया – उनका युवा पुत्र।
बाबा शरणदास – गाँव के बाहर पीपल के नीचे रहने वाले वृद्ध साधु।
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बरसात इस वर्ष भी धोखा दे गई थी। खेतों की मिट्टी फटकर मानो किसानों की तकदीर पढ़ रही थी। रामदीन दिनभर खेत में पसीना बहाता, पर घर लौटते समय उसकी मुट्ठी उतनी ही खाली होती जितनी सुबह थी।
उस रात भी वह भोजन के बाद चारपाई पर लेटा, पर नींद उसकी आँखों से कोसों दूर थी। गोमती ने पूछा, “क्या बात है जी? कई रातों से आपको नींद नहीं आती।”
रामदीन ने लंबी साँस ली।
“नींद तो उसे आती है, गोमती, जिसके मन पर बोझ न हो।”
गोमती चुप हो गई। वह जानती थी कि गरीबी से बड़ा कोई रोग नहीं, और चिंता से बड़ी कोई आग नहीं।
आधी रात बीत गई। चारों ओर ऐसा सन्नाटा था कि दूर कहीं कुत्ते के भौंकने की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। रामदीन उठकर गाँव के बाहर पीपल के पेड़ तक चला गया।
वहाँ बाबा शरणदास ध्यान में बैठे थे।
“आ गए रामदीन?” बाबा ने आँखें खोले बिना कहा।
रामदीन चौंक पड़ा।
“बाबा, आपने देखा भी नहीं, फिर पहचान कैसे लिया?”
बाबा मुस्कुरा दिए।
“जिसके कदम चिंता से भारी हों, उसे पहचानने के लिए आँखों की नहीं, अनुभव की ज़रूरत होती है।”
रामदीन उनके चरणों में बैठ गया।
“बाबा, यह रात इतनी खामोश क्यों होती है? दिनभर तो किसी तरह मन बहल जाता है, लेकिन रात होते ही अपने ही विचार आदमी को काटने लगते हैं।”
बाबा ने आकाश की ओर देखा।
“बेटा, दिन दुनिया का होता है, रात इंसान की। दिन में आदमी दूसरों के लिए जीता है, रात उसे अपने भीतर उतरना पड़ता है।”
रामदीन कुछ देर सोचता रहा।
“लेकिन मेरे भीतर तो केवल अभाव है, चिंता है और असफलता है।”
बाबा ने पीपल से गिरता एक सूखा पत्ता उठाया।
“देखो इसे। पेड़ ने इसे छोड़ दिया, इसलिए नहीं कि इससे बैर था; इसलिए कि नई कोंपलों के लिए जगह बन सके। जीवन भी कुछ छीनता है, ताकि कुछ नया जन्म ले सके।”
रामदीन की आँखें भर आईं।
“पर दुख कब तक?”
“जब तक तुम दुख को दंड समझोगे। जिस दिन उसे शिक्षक समझ लोगे, उसी दिन उसका अर्थ बदल जाएगा।”
उधर पूर्व दिशा में हल्की उजास फैलने लगी थी। पक्षियों का कलरव शुरू हो चुका था।
रामदीन घर लौटा। हरिया आँगन में हल की मूठ ठीक कर रहा था। गोमती चूल्हे पर रोटियाँ सेंक रही थी।
रामदीन के चेहरे पर पहली बार कई दिनों बाद शांति थी।
गोमती ने पूछा, “क्या बाबा ने कोई उपाय बता दिया?”
रामदीन मुस्कराया।
“उपाय नहीं, समझ दे दी। खेत सूख जाए तो किसान बीज बोना नहीं छोड़ता। फिर जीवन में एक बुरे मौसम से उम्मीद क्यों छोड़ दें?”
उस दिन से रामदीन की गरीबी समाप्त नहीं हुई। कर्ज भी तुरंत नहीं उतरा। संघर्ष भी कम नहीं हुआ। लेकिन उसके भीतर शिकायत की जगह धैर्य ने ले ली।
गाँव वाले कहते थे, “रामदीन बदल गया है।”
उन्हें क्या मालूम, बदलने वाला रामदीन नहीं था—वे खामोश रातें थीं, जिन्होंने उसे यह सिखा दिया था कि जीवन का सबसे गहरा सत्य शोर में नहीं, मौन में जन्म लेता है; और जो मनुष्य अपने मौन से मित्रता कर लेता है, वह विपत्तियों से हारता नहीं, उनसे सीखकर आगे बढ़ता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




