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त्योहारों का मौसम  — डॉक्टर मीरा कनौजिया काव्यांशी

 

त्योहारों का मौसम आया हम सब बच्चे अपनी नानी के घर गए। नवरात्रि के दशहरे की खूब धूम मची हुई थी मम्मी पापा और हम तीनों भाई बहन नानी के यहां जाकर के बहुत प्रसन्न हुए।

फिर क्या था दशहरा का दिन आ गया और मुन्ना ने रट लगाई अपने मामा से जल्दी चलो मामा दशहरा देखने के लिए। मामा बोले बेटा शाम होने दो अभी धूप है।
शाम होते ही हम सब खुशी खुशी तैयार होकर मुन्ना, रानी ,गुड़िया, रावण देखने चल पड़े ।दशहरे में बहुत ही भीड़ लगी हुई थी। अपार मेला लगा था गांव का मेला बड़ा ही सुंदर।
रावण जल गया तब मामा ने हम लोगों को कुल्फी खिलाई कुल्फी वाला साइकिल पर कुल्फी रखकर बेच रहा था बड़ा आनंद आया।
सभी और मैदान में चढ़े झूले। नए-नए स्टाल लगे थे खाने के फ्रूट चाट, और बंदूक का निशाना लगाने के लिए मैंने मामा से पैसे लिए और निशाना लगा दिया।
निशाना सही बैठा सभी ने बहुत जोर से तालियां बजा करके मेरा उत्साह बढ़ाया।
हम लोगों ने भेलपुरी गोलगप्पे बहुत बहुत मजे से खाया खूब पेट भर करके।
रानी ने मामी और मम्मी के लिए रंगीन चूड़ियां लेली।
मामा के दोस्त भी मिल गए ‌।
हम सबने मिलकर के खूब अच्छे से गांव का मेला दशहरे का देखा । खुशी-खुशी हम लोग घर आए। घर आकर के मां पिता को सारी बातें बताईं । मन करता है नानी के घर हर वर्ष दशहरा में सुंदर सा मेला देखने जाएं।
गांव का छोटा मेला ,लेकिन बहुत सुंदर, देख करके मन खुश हो गया। हर बार हम नानीके घर जाएंगे इसी प्रकार मेले का आनंद उठाएंगे।

डॉक्टर मीरा कनौजिया
काव्यांशी स्वरचित मौलिक

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