लखनऊ की आत्मा : बड़ा इमामबाड़ा की छाँव में एक दोपहर – लेखक – नरसा राम जांगु (राजस्थान)

लखनऊ देखा नहीं, महसूसा जाता है।
यह शहर आँखों से नहीं, तहज़ीब की खुशबू से दिल में उतरता है।
मैं जब पहली बार बड़ा इमामबाड़ा के सामने खड़ा हुआ, तो लगा जैसे समय ने यहाँ आकर जूता उतार दिया हो। ऊँचा, गर्वीला, मगर झुका हुआ सा… जैसे कोई नवाब आज भी अदब से कह रहा हो – “आइए, जनाब।”
दोपहर की धूप उसकी विशाल दीवारों पर फिसल रही थी। लखौरी ईंटों की उस भूल-भुलैया इमारत को देखकर समझ आया कि इसे भूखे को रोटी और कारीगर को काम देने के लिए बनवाया गया था – वाह, कैसी इमारत है जो भूख और हुनर दोनों की भूख मिटा दे।
मैंने भूल-भुलैया में कदम रखा। गाइड की आवाज गूंज कर लौट रही थी। अंधेरे-उजाले के गलियारे, एक-दूसरे को काटती हुई आवाजें, और हर मोड़ पर एक नया भ्रम। बाहर निकलने का रास्ता खोजते-खोजते मैं भीतर कहीं खो गया। तभी एक छोटी सी खिड़की से रूमी दरवाजे का धुंधला सा नजारा दिखा।
नीचे चौक की चहल-पहल, टुंडे कबाब की उठती महक, और पास की मस्जिद से आती अज़ान… सब कुछ एक साथ। लखनऊ एक साथ बहुत कुछ है, और फिर भी बहुत सुकून है।
यहाँ की दीवारें बोलती नहीं, फुसफुसाती हैं। कहती हैं – “हमने नवाब देखे हैं, अंग्रेज देखे हैं, और तुम्हें भी देख लिया।”
मैं बाहर निकला तो जेब में सिर्फ टिकट नहीं था, एक शहर की तहज़ीब की एक छोटी सी परछाई भी साथ आ गई थी।
लेखक – नरसा राम जांगु (राजस्थान)




