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मुखौटा — अलका गर्ग “अक्श 

 

जरूर नहीं कि मुखौटों के पीछे बुरा घिनौना व्यक्तित्व ही छिपा हो…कभी कभी पर्दे के पीछे बहुत धीर गंभीर और दयावान लोग भी होते हैं बिल्कुल नारियल या अखरोट की तरह ऊपर से कठोर परंतु अंदर से नरम…
त्रिलोकी जी बिल्कुल ऐसे ही इंसान थे। कई ईंट के भट्टों के मालिक, गाँव में नाम और रुतबा, कड़क आवाज और शानदार व्यक्तित्व के मालिक..।
जब कड़क चुन्नटदार धोती और सिल्क का कुर्ता, चारों उंगलियों में अँगुठियाँ सुर गले में मोटी लंबी चैन पहन अपनी सोने के मूँठ वाली बैंत ले कर निकलते थे तो देखने बालों के हाथ उनके अदब में स्वयं ही उठ जाते थे।
परंतु क्या मजाल जो त्रिलोकी जी रुक कर किसी की तरफ़ देख लें या घड़ी भर बात कर लें…। पूरे इलाके में वे बड़े ही कठोर और घमंडी इंसान के नाम से मशहूर थे।
भट्ठे के मज़दूर तो उनसे थर थर काँपते थे। अपने जिस भट्ठे पर वे पहुँच जाते उस दिन न वहाँ के लोग अपनी ख़ैर मनाते।
उनके यहाँ हर महीने मजदूरों की तनख़्वाह का एक हिस्सा काटे जाने के और हर दूसरे दिन सभी की नाइट ड्यूटी बदलने के सख़्त निर्देश थे। लोग उनके इन नियमों से ख़ुश नहीं थे पर विरोध करने से मजबूर थे।
एक दिन अचानक तेज आंधी तूफ़ान आने से भट्ठे पर सजा कर रखी हुई ईंटों की दीवार भरभरा कर गिर गई।उसकी चपेट में आकर तीन मजदूर बुरी तरह घायल हो गए। त्रिलोकी जी उस समय भट्ठे के ऑफिस में ही थे।उन्होंने तुरंत अपनी गाड़ी में तीनों मजदूरों को अस्पताल पहुंचाया।चोटें गहरी थीं उन तीनों को अस्पताल में भर्ती किया गया।
त्रिलोकी जी उनसे मिलने आए और उनके घर वालों से भी मिलने गए।
उनके घरवालों को अस्पताल में डॉक्टर और नर्सों से मालूम पड़ा कि इस अस्पताल का पूरा खर्च त्रिलोकी जी उठाते हैं। पूरे स्टाफ की तनख्वाह, इलाज मरीज और दवाइयों का खर्च रख रखाव सब कुछ..।
बीमारों से मिलने भी आते हैं।बीमार बच्चों के लिए खेल खिलौने किताबें लेकर आते हैं।
सुनने वाले हैरान थे..सभी इसे बहुत अच्छा सरकारी अस्पताल समझते थे कि इसीलिए यहाँ मुफ्त में इलाज होता है।
मजदूरों के वेतन का काटा गया पैसा चुपचाप उनकी पत्नियों को दिलवाते हैं जिससे कि मजदूर नशे में सारे पैसे उड़ा न दें ।पत्नियों को बच्चों के साथ घर चलाने में परेशानी न हो।
हर दो दिन में नाइट ड्यूटी बदलने का कारण भी वही जिससे कि रोज़ रात को नशे की आदत न पड़े।
तीनों मजदूर और उनके घरवाले मंत्र मुग्ध से त्रिलोकी जी के बारे में सुन रहे थे और उनकी सराहना कर रहे थे।
आज सभी उस कठोर मुखौटे के पीछे के नरम इंसान का सच जान चुके थे।

*अलका गर्ग “अक्श “*

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