दो रोटियों का सच – कविता साव पश्चिम बंगाल

बरसात का मौसम था। गाँव की पगडंडियाँ कीचड़ से भर गई थीं। खेतों में हरियाली थी, पर रामू किसान के घर में चूल्हा तीन दिन से नहीं जला था। उसकी पत्नी गीता ने बच्चों को बहलाकर सुला दिया था। भूख से बिलखते बच्चे आखिर कब तक सोते?
सुबह रामू मजदूरी की तलाश में निकला। पूरे दिन भटकने के बाद भी उसे काम न मिला। लौटते समय उसने देखा कि रास्ते में किसी का बटुआ पड़ा है। उसे उठाकर देखा तो उसमें काफी रुपये थे और साथ में एक वृद्ध की दवा की पर्ची भी रखी थी।
रामू के मन में एक क्षण के लिए विचार आया—”इन रुपयों से कई दिनों का राशन आ जाएगा। बच्चों का पेट भर जाएगा।”
लेकिन अगले ही क्षण उसके पिता की सीख कानों में गूँज उठी—”बेटा, भूख से बड़ा दुख नहीं, पर बेईमानी से बड़ी हार भी नहीं।”
वह पर्ची पर लिखे पते के सहारे उस वृद्ध के घर पहुँचा। दरवाज़े पर बैठे बूढ़े की आँखें रो-रोकर लाल हो चुकी थीं। बटुआ देखते ही उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
वृद्ध ने काँपते स्वर में कहा, “बेटा, यह रुपये मेरी जीवनभर की जमा-पूँजी नहीं थे, पर इनसे मेरी पत्नी की दवा आनी थी। यदि यह खो जाते, तो शायद उसकी साँसें भी साथ छोड़ देतीं।”
रामू ने चुपचाप बटुआ उसके हाथ में रख दिया। वृद्ध ने इनाम देना चाहा, पर उसने विनम्रता से मना कर दिया।
इतने में वृद्ध का बेटा बाहर आया। वह पास के कस्बे के विद्यालय का प्रधानाचार्य था। उसने रामू की दशा देखी और पूछा, “क्या करते हो?”
रामू ने मुस्कराकर कहा, “ईमानदारी बचाने की कोशिश करता हूँ, साहब। बाकी जो काम मिल जाए, वही कर लेता हूँ।”
उस उत्तर ने प्रधानाचार्य का हृदय जीत लिया। अगले ही दिन विद्यालय में चौकीदार की रिक्त जगह पर रामू की नियुक्ति हो गई।
कुछ महीनों बाद रामू का घर फिर से हँसी से भर गया। बच्चे पढ़ने लगे। चूल्हा रोज़ जलने लगा। एक दिन उसके बेटे ने पूछा, “बाबा, उस दिन अगर आप रुपये रख लेते, तो क्या बुरा होता?”
रामू ने बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, वे रुपये पेट तो कुछ दिनों के लिए भर देते, लेकिन आत्मा जीवनभर भूखी रहती।”
उस दिन बच्चे ने पहली बार समझा कि ईमानदारी का फल हमेशा रुपये नहीं होते, कभी-कभी वह पूरे जीवन का सम्मान बनकर लौटती है।
संदेश :
संकट चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, सत्य और ईमानदारी का मार्ग अंततः मनुष्य को सम्मान, विश्वास और स्थायी सुख प्रदान करता है।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




