एमएलएसयू में ‘अभियांत्रिकी, नवाचार और राष्ट्र निर्माण’ पर राष्ट्रीय मंथन

नानालाल आचार्य
इंडिया जागरण टुडे
उदयपुर। राष्ट्रीय अभियंता दिवस के अवसर पर मंगलवार, 15 सितंबर को मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर में “अभियांत्रिकी, नवाचार और राष्ट्र निर्माण” विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर एवं विज्ञान भारती, चित्तौड़ प्रांत के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस संगोष्ठी में तकनीकी विकास को सामाजिक, आर्थिक और राष्ट्रीय आवश्यकताओं से जोड़ने पर व्यापक विचार-विमर्श हुआ।
कार्यक्रम विश्वविद्यालय के अतिथि गृह स्थित बप्पा रावल सभागार में आयोजित हुआ। यह आयोजन महान अभियंता, राष्ट्र निर्माता एवं भारत रत्न सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती को समर्पित था। वक्ताओं ने कहा कि आज के समय में अभियंता की भूमिका केवल तकनीकी समाधान विकसित करने तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि उसे नवाचार, सामाजिक सरोकारों और राष्ट्र निर्माण के व्यापक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाना चाहिए।
तकनीक की दिशा और सामाजिक उपयोगिता पर विशेष जोर
संगोष्ठी में इस प्रश्न पर विशेष मंथन हुआ कि तेजी से विकसित होती कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष विज्ञान, जैव-प्रौद्योगिकी, रोबोटिक्स, डिजिटल तकनीक, ऊर्जा और उन्नत विनिर्माण जैसी तकनीकों को भारत की वास्तविक आवश्यकताओं से किस प्रकार जोड़ा जाए।
आयोजकों के अनुसार आवश्यकता केवल ऐसी तकनीक विकसित करने की नहीं है जो अत्याधुनिक हो, बल्कि ऐसी तकनीक की है जो भारत की वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सके, समाज के व्यापक वर्ग तक पहुँच सके और आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत के निर्माण में योगदान दे सके।डॉ. अरविंद सी. रानाडे ने जमीनी अभियांत्रिकी और नवाचार पर दिया जोर दिया। संगोष्ठी के मुख्य वक्ता डॉ. अरविंद सी. रानाडे, निदेशक, राष्ट्रीय नवप्रवर्तन संस्थान–भारत (NIF), गांधीनगर एवं राष्ट्रीय सचिव, विज्ञान भारती ने अपने संबोधन में जमीनी अभियांत्रिकी (Grassroot Engineering) की अवधारणा तथा जमीनी स्तर पर विकसित नवाचारों की पहचान, संरक्षण और प्रोत्साहन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। उन्होंने राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान- भारत के विजन और मिशन की जानकारी देते हुए बताया कि संस्था का उद्देश्य देश के जमीनी नवाचारों और पारंपरिक ज्ञान को पहचानना, उनका दस्तावेजीकरण करना तथा उन्हें तकनीकी एवं संस्थागत सहयोग प्रदान करना है। उन्होंने हल्दी के पेटेंट के लिए हुए संघर्ष का उदाहरण देते हुए पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण और बौद्धिक संपदा अधिकारों की रक्षा के महत्व को रेखांकित किया। डॉ. रानाडे ने राष्ट्रीय नवाचार प्रतिष्ठान द्वारा सहयोग प्राप्त पेटेंट और नवाचारों के कुछ उदाहरण भी प्रस्तुत किए। उन्होंने विद्यार्थियों एवं युवा शोधार्थियों से अपने आसपास की समस्याओं को नवाचार एवं जमीनी अभियांत्रिकी के अवसर के रूप में देखने का आह्वान किया।
विश्वेश्वरैया के जीवन से राष्ट्र निर्माण की प्रेरणा : प्रवीण रामदास
मुख्य अतिथि प्रवीण रामदास, राष्ट्रीय सचिव, विज्ञान भारती ने सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन, व्यक्तित्व और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने विश्वेश्वरैया जी की दूरदृष्टि, तकनीकी दक्षता, अनुशासन और देश के विकास के प्रति समर्पण को स्मरण करते हुए कहा कि उनका जीवन आज भी अभियंताओं और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
उन्होंने कहा कि विश्वेश्वरैया जी की विरासत को आगे बढ़ाते हुए अभियांत्रिकी और नवाचार को राष्ट्र की आवश्यकताओं से जोड़ना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।
तकनीकी शिक्षा का उद्देश्य समाज के लिए उपयोगी समाधान विकसित करना : प्रो. कैलाश डागा
कार्यक्रम की अध्यक्षता मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. कैलाश डागा ने की। उन्होंने कहा कि अभियांत्रिकी और तकनीकी शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल तकनीकी दक्षता हासिल करना नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की आवश्यकताओं के अनुरूप समाधान विकसित करना होना चाहिए।
उन्होंने विद्यार्थियों और युवा शोधार्थियों को नवाचार के लिए प्रोत्साहित करते हुए कहा कि बदलती तकनीकी दुनिया में निरंतर सीखना, नई सोच विकसित करना और समस्याओं को अवसर के रूप में देखना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल ज्ञान प्रदान करने तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्हें ऐसे नवाचार और शोध को बढ़ावा देना चाहिए, जो समाज के लिए उपयोगी और राष्ट्र के विकास में सहायक हों।
प्रो. डागा ने सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन से प्रेरणा लेते हुए तकनीकी उत्कृष्टता के साथ अनुशासन, दूरदृष्टि और राष्ट्रहित को जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों में वैज्ञानिक सोच और नवाचार की संस्कृति विकसित करके ही भारत की युवा शक्ति को राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रभावी रूप से लगाया जा सकता है।
पोस्टर प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी में विद्यार्थियों ने दिखाई रचनात्मकता
संगोष्ठी के अंतर्गत ‘राष्ट्र निर्माण में लोक विज्ञान की भूमिका’ विषय पर पोस्टर प्रतियोगिता एवं प्रदर्शनी आयोजित की गई। विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों ने पोस्टरों के माध्यम से लोक विज्ञान, स्वदेशी ज्ञान, तकनीकी नवाचार तथा राष्ट्र निर्माण से जुड़े विभिन्न विचारों को रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया। पोस्टर प्रतियोगिता में श्रेष्ठ तीन पोस्टरों का चयन किया गया तथा प्रथम, द्वितीय एवं तृतीय स्थान प्राप्त करने वाले प्रतिभागियों को समापन समारोह के दौरान पुरस्कार प्रदान किए गए। पोस्टर प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में में डॉ. शिखा अग्रवाल डॉ. तन्वी अग्रवाल, डॉ. विमल सारस्वत एवं डॉ. विक्रम सीरवी शामिल हुए।
जिज्ञासा समाधान सत्र में हुआ विशेषज्ञों से सीधा संवाद
कार्यक्रम में पंजीयन एवं दीप प्रज्वलन के बाद स्वागत उद्बोधन, स्वदेशी विज्ञान आंदोलन एवं राष्ट्र निर्माण पर विचार-विमर्श, मुख्य अतिथि का उद्बोधन तथा जिज्ञासा समाधान सत्र आयोजित हुआ। जिज्ञासा समाधान सत्र में विद्यार्थियों एवं युवा शोधार्थियों को विशेषज्ञों से सीधे संवाद करने का अवसर मिला। वक्ताओं ने कहा कि हर बड़ा नवाचार किसी छोटे-से प्रश्न से शुरू होता है। इसलिए युवाओं में यह दृष्टि विकसित करना आवश्यक है कि वे अपने आसपास की समस्याओं को वैज्ञानिक जिज्ञासा, शोध और अभियांत्रिकी के अवसर के रूप में देखें।
विश्वेश्वरैया की विरासत से आज के भारत तक
कार्यक्रम में सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया के जीवन और योगदान को स्मरण करते हुए कहा गया कि अभियांत्रिकी को यदि दूरदृष्टि और राष्ट्रहित से जोड़ा जाए, तो वह केवल संरचनाएँ नहीं, बल्कि समाज और संस्थाओं का भविष्य भी निर्मित कर सकती है। संगोष्ठी में यह विचार प्रमुखता से उभरा कि “अभियंता केवल समस्याओं का तकनीकी समाधान खोजने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि भविष्य की संभावनाओं को आकार देने वाला राष्ट्र-निर्माता भी है।”
कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. अमित कुमार गुप्ता संग सह-आयोजक सचिव डॉ. लोकेश कुमार अग्रवाल, डॉ. मोहन सिंह राठौड़ एवं श्रीमती मंजू चौधरी ने सहयोग किया।
मंच संचालन डॉ. गिरिमा नागदा एवं डॉ. कुलदीप शर्मा ने किया। संगोष्ठी की सलाहकार समिति में डॉ. एम. एल. कालरा, डॉ. रामेश्वर आमेटा, डॉ. अविनाश पंवार, डॉ. घनश्याम पुरोहित, डॉ. हरीश, डॉ. जितेंद्र सिंह राठौड़, डॉ. कुलदीप शर्मा, डॉ. कमल सिंह राठौड़, डॉ. गिरधर पाल सिंह, डॉ. मोहित गोखरू, डॉ. राहुल गर्ग, डॉ. विमल सारस्वत, डॉ. जया अरोड़ा, डॉ. विजय कोली, डॉ. देवेंद्र जैन, डॉ. तृप्ता जैन, डॉ. लेखराज, एवं डॉ. देवेंद्र कुमार शामिल रहे। आयोजन समिति में डॉ. प्रफुल्ल कोठारी, डॉ. हिम्मानी पालीवाल, डॉ. जयपाल सिंह राठौड़, डॉ. विमला डांगी एवं डॉ. पुनीत शर्मा सहित विश्वविद्यालय के शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सहयोग किया। आयोजकों ने बताया कि यह संगोष्ठी तकनीकी शिक्षा को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने, स्वदेशी नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा राष्ट्र निर्माण में युवाओं की भूमिका को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल रही।
इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी की आयोजन समिति ने सभी अतिथियों, वक्ताओं, प्रतिभागियों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के प्रति हार्दिक आभार व्यक्त किया।




