तेरे बिन सफलता कैसी? – कविता साव पश्चिम बंगाल

शहर के पुराने पुस्तकालय की खिड़की के पास बैठी सुधा अक्सर एक ही किताब के पन्ने पलटती रहती थी। किताब में क्या लिखा है, उसे खुद भी पता नहीं होता था। उसकी आँखें अक्षरों पर होतीं, लेकिन मन कहीं दूर भटक रहा होता—उस रास्ते पर, जहाँ से नील पहली बार उसके जीवन में आया था।
नील एक साधारण परिवार का प्रतिभाशाली युवक था। आँखों में बड़े सपने थे, लेकिन उन सपनों तक पहुँचने के रास्ते में आर्थिक अभाव, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और परिस्थितियों की अनेक दीवारें खड़ी थीं। सुधा एक संपन्न परिवार से नहीं थी, मगर उसके भीतर एक ऐसा धैर्य था, जो कठिन से कठिन समय में भी उम्मीद का दीप जलाए रखता था।
दोनों की मुलाकात कॉलेज के दिनों में हुई थी। नील पढ़ाई में अच्छा था, लेकिन कई बार परिस्थितियाँ उसकी प्रतिभा से बड़ी हो जाती थीं। कभी परीक्षा की फीस की चिंता, कभी घर की बीमारी, तो कभी नौकरी की तैयारी के लिए पुस्तकों का अभाव।
ऐसे हर मोड़ पर सुधा उसके साथ खड़ी मिलती।
नील निराश होकर कहता, “लगता है, मेरी किस्मत में कुछ बड़ा करना लिखा ही नहीं है।”
सुधा मुस्कराकर जवाब देती, “किस्मत उन लोगों से हार जाती है, जो कोशिश करना नहीं छोड़ते। तुम बस चलते रहो, रास्ते की चिंता मुझे करने दो।”
वह अपनी छोटी-छोटी इच्छाएँ छोड़कर नील की जरूरतें पूरी करती। अपने लिए खरीदी जाने वाली किताबें उसके लिए ले आती। वह बीमार पड़ता, तो अपनी पढ़ाई छोड़कर उसकी देखभाल करती। परीक्षा के दिनों में रात-रात भर जागकर उसके नोट्स तैयार करती। जब नील का आत्मविश्वास टूटने लगता, तो वह उसके बिखरे मन को समेटकर फिर उसके सपनों के सामने खड़ा कर देती।
नील अक्सर उसका हाथ थामकर कहता, “सुधा, जब मैं सफल हो जाऊँगा, तो सबसे पहले तुम्हें अपने जीवन में वह स्थान दूँगा, जिसकी तुम अधिकारी हो।”
सुधा उसकी आँखों में देखकर मुस्करा देती।
“मुझे कोई स्थान नहीं चाहिए, नील। बस तुम अपने लक्ष्य तक पहुँच जाओ।”
उस समय नील इस वाक्य का अर्थ नहीं समझता था। उसे लगता था कि सुधा की सादगी ही उसकी सबसे बड़ी खूबी है।
समय बीतता गया। नील की मेहनत रंग लाने लगी। पहले एक छोटी नौकरी मिली, फिर एक बड़ी परीक्षा में सफलता का अवसर सामने आया। अब उसके जीवन की दिशा बदल सकती थी। लेकिन इस सफलता के साथ एक ऐसी शर्त जुड़ी थी, जिसके बारे में सुधा बहुत पहले से सोच रही थी।
नील के परिवार को उसके भविष्य से बहुत उम्मीदें थीं। वे चाहते थे कि वह अपने सामाजिक और आर्थिक स्तर के अनुरूप विवाह करे। सुधा का परिवार साधारण था। घर की जिम्मेदारियाँ थीं, आर्थिक सुरक्षा नहीं थी और भविष्य को लेकर अनिश्चितताएँ थीं।
सुधा जानती थी कि नील उससे प्रेम करता है। वह यह भी जानती थी कि नील उसके लिए अपने परिवार से लड़ सकता है। लेकिन वह नहीं चाहती थी कि उसके कारण नील अपने माता-पिता से दूर हो, अपने सपनों और पारिवारिक संबंधों के बीच किसी एक को चुनने के लिए विवश हो जाए।
उसने मन ही मन एक निर्णय कर लिया।
एक शाम दोनों नदी के किनारे बैठे थे। सूरज धीरे-धीरे क्षितिज में उतर रहा था। पानी पर बिखरी सुनहरी किरणें ऐसी लग रही थीं, मानो दिन अपने अंतिम क्षणों में भी संसार को सुंदर बनाने की कोशिश कर रहा हो।
नील अपने भविष्य की योजनाएँ बता रहा था।
“सुधा, बस यह परीक्षा निकल जाए। फिर मैं तुम्हें अपने घर ले चलूँगा। बहुत सह लिया हमने। अब तुम्हें किसी बात की चिंता नहीं करने दूँगा।”
सुधा चुप रही।
“क्या हुआ?” नील ने पूछा।
उसने बहुत कोशिश की कि उसकी आवाज सामान्य रहे।
“नील, मुझे लगता है कि अब हमें अलग हो जाना चाहिए।”
नील कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर हँसकर बोला, “अच्छा मजाक है! आज अचानक तुम्हें यह क्या सूझा?”
“मैं मजाक नहीं कर रही हूँ।”
उसकी आवाज में ऐसा ठहराव था कि नील की हँसी वहीं रुक गई।
“तुम कहना क्या चाहती हो?”
“यही कि तुम मुझे भूल जाओ। अपने जीवन में आगे बढ़ो। तुम्हारे सामने बहुत बड़ा भविष्य है। तुम्हें किसी भी उलझन में नहीं पड़ना चाहिए।”
नील ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“और तुम? तुम्हारा भविष्य कहाँ है, सुधा? उसमें मेरा कोई स्थान नहीं?”
सुधा ने हाथ छुड़ाने की कोशिश की, लेकिन नील ने उसे और कसकर नहीं, बल्कि इस डर से थामे रखा कि कहीं वह सचमुच दूर न चली जाए।
“तुम जानती हो न, मैं तुम्हारे बिना जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकता।”
सुधा की आँखें भर आईं। उसने अपना चेहरा दूसरी ओर कर लिया।
“कल्पना करना सीख लो, नील। जीवन हमेशा हमारी इच्छाओं के अनुसार नहीं चलता।”
“तो क्या प्रेम केवल इच्छा है, जिसे परिस्थितियों के सामने छोड़ दिया जाए?”
सुधा के पास उत्तर था, लेकिन वह उसे कह नहीं सकती थी। वह बताना चाहती थी कि वह नील को छोड़ नहीं रही, बल्कि उसके रास्ते से स्वयं हट रही है। वह बताना चाहती थी कि उसके जाने की कीमत वह भी चुका रही है। मगर उसने अपने शब्दों को होंठों के भीतर ही रोक लिया।
वह उठी और बिना पीछे देखे चली गई।
उस दिन नील ने पहली बार जाना कि किसी का साथ छूटना और किसी का जान-बूझकर साथ छोड़ देना, दो अलग-अलग दुख हैं।
पहले कुछ दिनों तक नील ने सुधा को मनाने की हर कोशिश की। उसने पत्र लिखे, फोन किए, उसके घर के बाहर घंटों प्रतीक्षा की। लेकिन सुधा ने अपने चारों ओर एक ऐसी चुप्पी खड़ी कर ली थी, जिसे नील की पुकार भी नहीं तोड़ पा रही थी।
एक दिन उसे सुधा का पत्र मिला।
उसमें लिखा था—
“नील,
तुम्हारी सफलता के रास्ते में मैं कोई प्रश्नचिह्न नहीं बनना चाहती। तुमने जीवन में जो कुछ पाने का सपना देखा है, उसे पूरा करो। मेरी चिंता मत करना। कुछ रिश्ते साथ चलकर मंजिल तक पहुँचते हैं और कुछ दूर रहकर भी किसी की यात्रा का आधार बन जाते हैं।
तुम्हारी सफलता ही मेरी खुशी होगी।
मुझे भूल जाना।
—सुधा”
नील ने पत्र कई बार पढ़ा। हर बार उसे लगा कि इन शब्दों के पीछे कोई ऐसी बात छिपी है, जिसे सुधा जानबूझकर उससे छिपा रही है।
उसने पत्र सीने से लगाया और बुदबुदाया, “तुम्हें कैसे समझाऊँ, सुधा? मेरी सफलता का सपना तो तुम्हारी आँखों से शुरू हुआ था। अब उसी सफलता में तुम्हें ही जगह नहीं है।”
लेकिन समय किसी के दुख के लिए नहीं रुकता।
नील ने धीरे-धीरे खुद को काम में डुबो दिया। पहले वह हर छोटी-बड़ी बात सुधा को बताता था। अब कोई उपलब्धि मिलती, तो कुछ क्षण के लिए उसका हाथ फोन की ओर बढ़ता, फिर उसे सुधा का पत्र याद आ जाता।
वह फोन वापस रख देता।
धीरे-धीरे उसने उससे संपर्क करने की कोशिश करना बंद कर दिया। सुधा की तस्वीर अब भी उसके पास थी, लेकिन उसने उसे देखना कम कर दिया। वह उस जीवन की ओर बढ़ने लगा, जिसे सुधा ने उसके लिए चुना था, जबकि उसका अपना मन उस जीवन को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था।
कुछ समय बाद नील को बड़ी सफलता मिली। उसका चयन हो गया। घर में उत्सव हुआ। मिठाइयाँ बँटीं, रिश्तेदारों के फोन आए और पिता की आँखों में गर्व के आँसू थे।
सबने कहा, “नील, तुम्हारी मेहनत सफल हो गई।”
नील मुस्कराया।
उस रात जब घर के सभी लोग सो गए, वह अपनी मेज पर बैठा रहा। सामने नियुक्ति-पत्र रखा था। जिस कागज को पाने के लिए उसने वर्षों मेहनत की थी, वह आज उसके सामने था। लेकिन उस खुशी को बाँटने के लिए वह एक आवाज नहीं थी, जिसे सुनने के लिए उसका मन सबसे अधिक व्याकुल था।
उसने पहली बार अपनी सफलता से प्रश्न किया—
“तुम्हें पाने के लिए मैंने कितने रास्ते तय किए। मगर अब तुम्हें किसे दिखाऊँ? जिस व्यक्ति ने मुझे इस मंजिल तक पहुँचाने के लिए अपना सब कुछ लगा दिया, वही मेरी खुशी से अनजान है। यह कैसी जीत है, जिसमें सबसे प्रिय व्यक्ति ही अनुपस्थित है?”
उधर सुधा को भी नील की सफलता का समाचार मिल गया था।
उस दिन वह अपने घर की छत पर बहुत देर तक खड़ी रही। सामने आसमान में चाँद निकला था, लेकिन उसे उसकी रोशनी भी फीकी लग रही थी।
उसने नील की पुरानी तस्वीर निकाली। तस्वीर में दोनों मुस्करा रहे थे। नील के चेहरे पर भविष्य के सपने थे और सुधा की आँखों में उस भविष्य में साथ होने का विश्वास।
उसने तस्वीर पर उँगलियाँ फेरीं।
“देखो नील, तुम सफल हो गए। तुमने वह सब पा लिया, जिसके लिए तुमने संघर्ष किया था। अब तुम्हें कोई नहीं रोक सकता।”
उसकी आवाज टूट गई।
“लेकिन मैं किससे कहूँ कि तुम्हारी इस सफलता में मेरा भी थोड़ा-सा जीवन लगा है? किससे कहूँ कि तुम्हें भूलने की सलाह देते समय मैंने अपने मन को कितनी बार समझाया था? मैं तुम्हारे लिए रास्ता आसान करना चाहती थी, नील। मुझे क्या पता था कि तुम्हारे रास्ते से हटते-हटते मैं तुम्हारे जीवन से ही हट जाऊँगी।”
उसने तस्वीर सीने से लगा ली।
वह रोना नहीं चाहती थी। उसे लगता था कि आँसू बहाने से कहीं उसका अपना निर्णय कमजोर न पड़ जाए। मगर कुछ पीड़ाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें मन में बंद रखने से वे समाप्त नहीं होतीं; वे धीरे-धीरे जीवन के हर कोने में फैल जाती हैं।
सुधा अब भी वही थी—सबकी सहायता करने वाली, दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाने वाली, अपने दुख को हँसी के पीछे छिपा लेने वाली।
लेकिन अब उसके भीतर एक कमरा ऐसा था, जिसका दरवाजा उसने स्वयं बंद कर लिया था। वहाँ नील की यादें थीं, उसके अधूरे वादे थे और वे तमाम बातें थीं, जिन्हें वह कभी उससे कह नहीं सकी।
कई महीने बीत गए।
एक दिन नील को सुधा के शहर में किसी काम से आना पड़ा। स्टेशन से बाहर निकलते समय उसकी नजर सामने एक पुस्तकालय पर पड़ी। वही पुराना पुस्तकालय, जहाँ सुधा खिड़की के पास बैठकर किताबें पढ़ा करती थी।
वह अनायास भीतर चला गया।
खिड़की के पास वही मेज खाली थी।
नील कुछ देर वहाँ खड़ा रहा। फिर पुस्तकालय के कर्मचारी से पूछ बैठा, “यहाँ सुधा नाम की एक लड़की आती थी। क्या अब भी आती है?”
कर्मचारी ने कहा, “हाँ, कभी-कभी। आज सुबह भी आई थी। कुछ किताबें लौटाकर गई है।”
नील ने जेब से एक कागज निकाला। बहुत दिनों से वह सुधा को एक पत्र लिखना चाहता था, मगर लिख नहीं पाया था। आज उसने उसी कागज पर कुछ पंक्तियाँ लिखीं—
“सुधा,
तुमने कहा था कि मैं तुम्हें भूल जाऊँ। मैंने कोशिश की। तुम्हारे बिना जीना भी सीख रहा हूँ। लेकिन एक बात आज तक नहीं सीख पाया—तुम्हारे त्याग को अपनी खुशी का नाम देना।
तुमने मेरे लिए जो किया, उसका ऋण मैं कभी नहीं चुका सकता। मगर मैं यह भी नहीं समझ पाता कि मेरी जिंदगी का निर्णय तुमने अकेले क्यों लिया। क्या प्रेम में मुझे इतना अधिकार भी नहीं था कि मैं तुम्हारे साथ कठिनाइयों का सामना कर सकूँ?
तुम्हारी चुप्पी ने मुझे तुमसे दूर कर दिया है, लेकिन तुम्हारे प्रति मेरे मन में कोई शिकायत नहीं है। बस एक प्रश्न है—क्या किसी को खुश रखने के लिए उससे उसकी खुशी छीन लेना उचित है?
तुम्हारा, नील”
पत्र लिखकर वह देर तक बैठा रहा। फिर उसने उसे मोड़ा, जेब में रखा और पुस्तकालय से बाहर निकल आया।
उसने पत्र भेजा नहीं।
शायद अब उसे डर था कि सुधा फिर वही कहेगी—आगे बढ़ जाओ।
और इस बार वह उससे यह भी नहीं पूछ पाएगा कि जिस रास्ते पर वह आगे बढ़ गया, उस पर सुधा पीछे क्यों रह गई।
सुधा को उस पत्र के बारे में कभी पता नहीं चला।
जीवन अपनी गति से चलता रहा। नील अपने काम में व्यस्त हो गया। सुधा अपने दायित्वों में। दोनों ने अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारियाँ निभाईं, लेकिन उनके भीतर एक प्रश्न अनुत्तरित रह गया।
नील के पास सफलता थी, सुधा के पास त्याग का संतोष था। मगर दोनों के मन में कहीं न कहीं एक खाली जगह भी थी।
क्योंकि प्रेम में कभी-कभी दो लोग एक-दूसरे को इतना चाहने लगते हैं कि एक दूसरे के लिए स्वयं निर्णय लेने लगता है। वह सोचता है कि उसका दूर जाना ही दूसरे की खुशी है। और दूसरा इस बात से दुखी होता है कि उसे प्रेम तो मिला, लेकिन अपने प्रेम के भविष्य को चुनने का अवसर नहीं मिला।
सुधा ने नील को आगे बढ़ने के लिए कहा था। नील आगे बढ़ गया।
लेकिन वह यह नहीं जान पाई कि उसके शब्दों का पालन करते-करते नील ने उससे बात करना ही क्यों छोड़ दिया। और नील यह नहीं जान पाया कि सुधा ने उसे रोकने की इच्छा होते हुए भी उसे रोका क्यों नहीं।
दोनों ने एक-दूसरे के लिए बहुत कुछ किया था।
बस, एक बात नहीं कर पाए—अपने मन की बात एक-दूसरे से कह नहीं पाए।
कभी-कभी प्रेम की सबसे बड़ी त्रासदी बिछड़ना नहीं होती; त्रासदी यह होती है कि दो लोग एक-दूसरे को खोना नहीं चाहते, फिर भी एक-दूसरे को खो देने का निर्णय कर लेते हैं।
कविता साव
पश्चिम बंगाल




