चाय से रिश्ता – शिखा खुराना

बचपन में चाय हमारे लिए किसी रहस्यमयी चीज़ से कम नहीं थी।
घर के बड़े जब सुबह-सुबह सुड़क-सुड़क चाय पीते, तो लगता मानो कोई अमृत रस चल रहा हो, जिसे बच्चों से जानबूझकर छुपाया जा रहा है।
और ऊपर से रोज़ वही चेतावनी “बच्चे चाय नहीं पीते,चाय पीने से रंग काला हो जाता है!” अब बचपन का मन भी बड़ा जिद्दी होता है। जितनी रोक, उतनी उत्सुकता। सर्दियों में कभी ज़ुकाम हो जाता तो दादी अदरक-इलायची वाली आधा कप चाय देतीं। बस वही आधा कप हमें किसी पांच सितारा दावत से कम नहीं लगता धीरे-धीरे घूंट भरते और मन ही मन भगवान से प्रार्थना करते, “हे प्रभु! ये बुखार थोड़ा और टिक जाए”।
फिर एक बार गर्मियों की छुट्टियों में चचेरे भाई हमारे घर आए।
उनकी जिंदगी का आधार ही शायद चाय थी। हर घंटे रसोई में भगोना चढ़ जाता, “एक कड़क चाय बना दो!” और देखते ही देखते गिलास भर-भर चाय गायब। हम बच्चों की हालत उस गरीब दर्शक जैसी थी जो मिठाई की दुकान के बाहर खड़ा होकर केवल खुशबू से पेट भरता है।
हम बस ट्रे उठाकर पहुंचाते और खाली गिलास वापस लाते।
समय बदला, स्कूल की यूनिफॉर्म उतरकर कॉलेज का दुपट्टा कंधों पर आया और साथ ही मिली “चाय पीने की स्वतंत्रता”। कैंटीन की वो उबलती हुई चाय, जिसमें दूध कम, पानी ज्यादा और दोस्ती सबसे ज्यादा होती थी। कभी क्लास बंक करके, कभी नोट्स के बहाने, कभी दिल टूटने पर, तो कभी बिना वजह, हर समस्या का समाधान था, “चल चाय पीते हैं।”
धीरे-धीरे हाल ये हो गया कि घर में मेरी पहचान ही “लौटा भर चाय” वाली की बन गई। सुबह आंख खुलते ही रसोई में चाय का बड़ा भगोना चढ़ता। घर वाले मज़ाक उड़ाते, “इसे कप मत देना, इसके लिए तो बाल्टी भर चाहिए!” बाहर कहीं घूमने जाते तो दोस्त होटल वाले से पूछते, “भैया, इनके लिए फैमिली पैक चाय है क्या?” और सच कहूं तो चाय कभी सिर्फ चाय नहीं रही।
वो बहाना थी, रिश्ते जोड़ने का,
गिले मिटाने का, दिल ह




