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विषय संघर्ष की राह – रमेश शर्मा

 

आज की कहानी एक ऐसे शख्स की है जिन्होंने बचपन में ही अपने पिता को खो दिया। मां अपने तीन बच्चों को लेकर पीहर आ गई। आज से पेंसठ साल पहले इन हालातों की कल्पना करके हृदय कांप उठता है।
गांव में रहते हुए पढ़ाई करना और स्कूल से आने के बाद कृषि कार्यों में हाथ बंटाना ही दिनचर्या थी। इनके एक मामाजी जयपुर में विद्युत विभाग में कार्यरत थे ‌‌। बारहवीं करके जयपुर आ गये ‌। यहां हिंदी में शोर्ट हेंड और टाइपिंग सीखी। इसी दौरान इनकी शादी हो गई। इन्हें पहली नौकरी जोधपुर विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष हिंदुस्तान के नामी हिंदी समालोचक डा‌ नामवर सिंह जी के निजी सचिव के रूप में मिली‌। अपनी काबिलियत और मृदुभाषी स्वभाव से डा नामवर सिंह जी को ऐसा प्रभावित किया कि वे उन्हें जोधपुर से आगरा और आगरा से जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अपने साथ ले गए।
वहां भी अपनी मेहनत कार्य कौशल और मृदुभाषी स्वभाव के कारण अपने सहयोगियों और अधिकारियों में लोकप्रिय रहे। और हिंदी अधिकारी के पद से रिटायर हुए।
अपना संपूर्ण जीवन संघर्षों में बिताकर अपने दो पुत्र और एक पुत्री को अच्छे से पढ़ाया लिखाया और उनकी अच्छे घरों में शादियां कर अपनी जिम्मेदारियां पूर्ण की।
आज एक सफल जीवन अपने परिवार के साथ बिता रहे हैं।
अपने परिवार और समाज में एक उदाहरण प्रस्तुत कर रहे हैं।

रमेश शर्मा

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