संस्मरण लेख : वो भी क्या दिन थे-बिजली गुल और छत पर मेला – श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’ (सुरेंद्रनगर-गुजरात)

जब गर्मियों की रातों में बिजली का चला जाना किसी मुसीबत से काम नहीं होता। पर जैसे ही रातों में बिजली गुल हो जाती थी तो पूरा मोहल्ला अंधेरों में ढक जाता था। हर घर के लोग बिस्तर लेकर अपने-अपने छत पर पहुंच जाते और देखते ही देखते पूरा मोहल्ला एक परिवार सा लगने लगता। जब बिजली गुल हो जाती और सब छत पर आ जाते तो बच्चे को तो बहुत मजा आता।कोई मोबाइल की लाइट चालू कर देता। कोई टॉर्च लेकर घूमता तो कोई आसमान के तारे देखने लगते। कोई बार बच्चे चादर ओढकर भूत बन जाते।दूसरे बच्चों को डराने में उसको बहुत मजा आती थी। बच्चे खूब हंसी उड़ाते थे।बच्चों ने खेलने में आनंद आता था। कई शरारती बच्चे एक छत से दूसरी छत पर कुदते थे। बड़े लोग भी कोई किस्सा सुनाता तो कोई अपने गांव की याद ताजा करता।रात के अंधेरे में कोई कुल्फी गोला वाला आता तो बच्चे अपने मां बाप के पास पैसा मांगने के लिए दौड़ पड़ते। धीरे-धीरे यूं ही हवा चलने लगती आसमान तारों से भर जाता और लोग खुले आसमान में सो जाते थे।
सचमुच वो दिन चिर स्मरणिय दिन है जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था। सर्दियों में मम्मी अंगीठी कमरे में ले आती थी। अंगीठी पर रोटी पकाती थी हम सब गरम गरम रोटियां खाते थे। अंगीठी के पास बैठकर दादा दादी कहानी सुनाते थे। बिजली गुल हो जाती वो भी याद नहीं रहता था। आज बिजली शायद कम चली जाती है लेकिन वो छतों का मेला वो अपनापन हंसी मजाक शायद अब कहीं खो गए हैं। रिश्तो में पहले जैसी मिठास दिखाई नहीं देती। जब मैं सातवीं कक्षा में पढ़ता था तब और आज बहुत फर्क पड़ गया है।आज जब बिजली गुल हो जाती है तो सब मोबाइल लेकर बैठ जाता है। अकेले में रहना पसंद करते हैं।सब मोबाइल में व्यस्त रहता है। बिजली कब चली गई और कब आ गई वो भी पता नहीं चलता है।जीवन में किसी का जरिया बनो
दरिया नहीं दरिया बनना आसान है किसी को भी डुबो दो अच्छे शांत जीवन में तूफ़ान उठा कर लेकिन किसी के जीवन को शांत और बेहतर बनाने में जरिया बनना कठिन है फैसला आपके हाथ में है।
श्री पालजीभाई वी राठोड़ ‘प्रेम’
(सुरेंद्रनगर-गुजरात)




