लेख: पीढ़ियों के बीच बढ़ती खामोशी – लेखक: राजेश कुमार ‘राज’

आज जब पुराना वक़्त याद आता है तो बरबस एक दृश्य ऑंखों के सामने तैर जाता है जिसमें गाॅंव या कस्बे की चौपाल पर हुक्का गुड़गुड़ाते और हॅंसी-ठिठोली करते वयस्क, समूह में बैठ कर बतियाती और काम-काज करती महिलाऍं एवं धमा-चौकड़ी करते बच्चे दिखाई पड़ते हैं। लेकिन अब गाॅंव और कस्बों से ऐसे दृश्य नदारद हो चुके हैं। अब लोग आपस में संवाद कम ही करते हैं।
यूॅं तो पीढ़ियों के बीच वैचारिक अंतर हमेशा से विद्यमान रहा है लेकिन आज उसकी दूरी भयावह रूप से बढ़ गई है। गाॅंवों की नई पीढ़ी खेती-किसानी से विमुख होकर नौकरी की चाह में शहरों की तरफ़ भाग रही है और जो एक बार गाॅंव से शहर गया फिर वह शहर का ही होकर रह जाता है। पीढ़ियों के बीच खामोशी का पलायन भी एक कारण है। दूसरा बड़ा कारण टैक्नोलॉजी है। आज मोबाइल ने मनुष्य को मनुष्य से दूर कर दिया है। वीडियो काॅल ने रू-ब-रू मिलन के अवसरों को सीमित कर दिया है और वाट्सअप जैसे मैसेजिंग ऐप्स ने चिट्ठी-पत्री का स्थान ले लिया है। मिल-बैठ कर संवाद करने के अवसर गायब से हो गए हैं। तीसरे, पुरानी पीढ़ी घिसी-पिटी परम्पराओं और मान्यताओं को छोड़ना नहीं चाहती और नई पीढ़ी हमारी पुरानी लेकिन आज भी प्रासंगिक परम्पराओं को अपनाना नहीं चाहती। इन्हीं कारणों से पीढ़ियों के बीच संवादहीनता व्याप्त है। कुल मिला कर, संवादहीनता, तकनीकी उन्नति और पीढ़ियों के बीच का वैचारिक अंतर पीढ़ियों के बीच बढ़ती खामोशी के मुख्य कारण हैं।
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