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बदलते समय का कोलाहल और खोती संवेदनशीलता’ –डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’ अहमदाबाद, गुजरात।

 

​आज का दौर ‘अति-गतिशीलता’ और बाज़ारवाद का है, जहाँ तक़नीक ने दुनिया को उंगलियों पर तो ला दिया है, लेकिन वास्तविक मानवीय रिश्ते सिमटते जा रहे हैं। सूचनाओं की बाढ़ के बीच ज्ञान, समझ और सबसे बढ़कर हमारी ‘संवेदनशीलता’ का अकाल पड़ गया है।
​हर तरफ़ फैलें इस अजीब से कोलाहल ने मनुष्य को एक उत्पाद बना दिया है। अब किसी की त्रासदी हमारे भीतर स्थायी करुणा नहीं जगाती, बल्कि वह सोश्यल मीडिया पर मात्र कुछ सेकंड का ‘रिएक्शन’ या ‘रीट्वीट’ बनकर रह गई है। महानगरों की कंक्रीट की गगनचुंबी इमारतों के नीचे एकाकीपन का सन्नाटा है। हम चाँद तक़ पहुँच गए, लेकिन पड़ोस की सिसकियों से बेख़बर हैं।
​समय आ गया है कि हम इस अंधी दौड़ से ठहरें। प्रगति का पैमाना केवल आर्थिक या तक़नीकी न होकर हमारा सहानूभूतिपूर्ण होना होना चाहिए। संवेदनशीलता को बचाना ही इस दौर की सबसे बड़ी ज़रूरत है।

-डो.दक्षा जोशी ‘निर्झरा’
अहमदाबाद, गुजरात।

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