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जब मिले थे उनसे पहली बार — सुनीता तिवारी”सरस”

लघु कथा

कॉलेज का दसवां दिन था। हल्की-सी घबराहट, नई जगह और अनजान चेहरे,सब कुछ जैसे किसी अनकही कहानी की शुरुआत बन रहा था। मैं लाइब्रेरी के कोने में बैठी नोट्स पलट रही थी , तभी दरवाज़ा धीरे से खुला और वह अंदर आये, सफेद पेंट शर्ट में सादगी का ऐसा उजाला था कि एक पल को लगा, जैसे समय ठहर गया हो।

वह मेरे सामने वाली मेज़ पर आकर बैठ गये बालों की एक लट बार-बार उसके चेहरे पर आ जाती और वह उसे हल्के से कान के पीछे सरका देते। मैं पढ़ने की कोशिश करती, पर हर बार निगाहें अनजाने में उसी ओर चली जातीं।

अचानक उसने मुस्कुराकर कहा, ये सीट खाली है ना?
मैं जैसे चौंक गई, हाँ-हाँ, बिल्कुल।

उसकी आवाज़ में एक अजीब-सा अपनापन था। कुछ देर तक हम दोनों चुपचाप अपने-अपने पन्नों में खोए रहे, लेकिन उस खामोशी में भी एक मधुर संवाद चल रहा था।

थोड़ी देर बाद उसने पूछा, आप भी हिंदी ऑनर्स में हैं।
मैंने सिर हिलाया, हाँ
और आप।
मैं भी, उसने कहा, पहला दिन है, थोड़ा अजीब लग रहा है।

हम दोनों हल्के-से हँस पड़े। उस हँसी में एक रिश्ता जन्म ले रहा था, अनजाना, पर बहुत अपना।

धीरे-धीरे बातें बढ़ने लगीं, कविताओं से लेकर पसंदीदा किताबों तक, और फिर जीवन के छोटे-छोटे किस्सों तक। वक्त कैसे बीत गया, पता ही नहीं चला। लाइब्रेरी की घंटी बजी, तो लगा जैसे कोई सपना टूट गया हो।

बाहर निकलते वक्त उसने कहा, कल मिलेंगे?
मैंने मुस्कुराकर जवाब दिया, ज़रूर
यहीं, इसी जगह।

उस दिन के बाद लाइब्रेरी सिर्फ किताबों की जगह नहीं रही, वह हमारी मुलाकातों की गवाह बन गई।

आज जब उन पलों को याद करती हूँ, तो लगता है पहली मुलाकातें सिर्फ शुरुआत नहीं होतीं, वे दिल में हमेशा के लिए बस जाने वाली कहानी बन जाती हैं।
और वह पहली बार
मेरे जीवन की सबसे खूबसूरत याद बन गई।

सुनीता तिवारी”सरस”

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