डरना नहीं तुम्हें लड़ना है मीना खन्ना

पर किसी से ये जो चार लोगों है आस-पास
पर ये तो कोई नहीं बस चाबी वाले गुड्डे
असली लड़ाई तो खुद से , अंदर की डरी
सहमी रूह से है जो अपने अनुमानों
से तराज़ू तौल लेती है
जो आईने में चेहरा नहीं देखती
देखती है लोगों की नज़रें से
अपने रंग रूप , अपने पहनावे को
अपने लक्ष्य से उसे तंज कसने वाले
लोगों के शब्द कंकर से लगते हैं
व्यर्थ सोच विचार कर कर क्यों
खुद पीड़ा सहती है
तुम्हें कोई कन्धा भला क्यों देगा
कोई तुम्हारी बोझ क्यों सहेगा
तुम और को छोड़ स्वयं में बदलाव कब
करोही हे नारी
हे नारी तुम के लिए कब तक हाथ फैला
होगी हे नारी
तुम विधा हो जानती हो
तुम स्वयं की शक्ति पहचानती हो
तुम जननी हो जग तारिणी हो
हे नारी फिर क्यों डर के पक्षी के पिंजरे
में तुम पलती है ज़ंजीरों को तोड़ी
खोलो द्वार तुम उस इस पिंजरे के
भर लो उड़ान तुम भी जी भर के
सम्मान तभी मिलेगा पाएगा
वरना डर के ग़र बैठ गई
हे नारी पुरुष का पुण्य हो
उसका प्रताप हो
इसके जीवन का तुम सुप्रभात हो
स्वयं नारी शब्द में’ नर “ निहित है
इसलिए तुम्हारी महिमा सर्वविदित है
मीना की सोच – बम्बई से




